भाजपा की पसंद पर भारी पड़े बागी, निकाय चुनाव में कई जगह पलटी बाजी
झारखंड में संपन्न हुए नगर निकाय चुनाव के नतीजे प्रदेश भाजपा के लिए चिंतन का सबब बन गये हैं.
By PRABHAT GOPAL JHA | Updated at :
सतीश कुमार, रांचीझारखंड में संपन्न हुए नगर निकाय चुनाव के नतीजे प्रदेश भाजपा के लिए चिंतन का सबब बन गये हैं. एक ओर जहां पार्टी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई और बड़े नेताओं की घेराबंदी के बाद भी जीत का दावा किया था, वहीं धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट दिखी. कई महत्वपूर्ण निकायों में भाजपा के बागी उम्मीदवारों ने पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशियों को न केवल कड़ी टक्कर दी, बल्कि धूल चटाते हुए बड़ी जीत भी हासिल की.
जमीनी हकीकत को समझने के दावों पर गंभीर सवाल खड़े किये
इन नतीजों ने पार्टी की प्रत्याशी चयन प्रक्रिया और जमीनी हकीकत को समझने के दावों पर गंभीर सवाल खड़े किये हैं. गैर दलीय चुनाव में प्रदेश भाजपा की ओर से मेयर और नगर परिषद व नगर पंचायत अध्यक्ष पद पर समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया था. चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि भाजपा नेतृत्व की ओर से थोपे गये उम्मीदवार स्थानीय कार्यकर्ताओं और जनता की पहली पसंद नहीं थे. भाजपा नेतृत्व ने बागियों के बढ़ते प्रभाव को भांपते हुए डैमेज कंट्रोल की पूरी कोशिश की थी.
असंतोष को शांत करने में नाकाम रहे
पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा वर्मा और राष्ट्रीय मंत्री ऋतुराज सिन्हा जैसे दिग्गज नेताओं ने जिलों में कैंप किया. इसके बाद भी वह स्थानीय स्तर पर उपजे असंतोष को शांत करने में नाकाम रहे. पार्टी ने अपनी साख बचाने के लिए सख्ती का रास्ता अपनाया था. पूर्व विधायक संजीव सिंह समेत डेढ़ दर्जन बड़े नेताओं को शोकॉज जारी कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गयी थी. जिलों में सैकड़ों अन्य कार्यकर्ताओं को भी नोटिस थमाया गया, लेकिन यह दबाव भी बागियों के हौसले और मतदाताओं के मिजाज को बदलने में कारगर साबित नहीं हुआ.
स्थानीय नब्ज नहीं टटोलना बना अहम कारण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों में भाजपा के खराब प्रदर्शन की मुख्य वजह प्रत्याशी चयन में स्थानीय नब्ज को नहीं टटोलना है. टिकट बंटवारे में कार्यकर्ताओं की राय को दरकिनार कर दिल्ली और रांची से लिये गये फैसलों ने स्थानीय स्तर पर बड़े असंतोष को जन्म दिया. कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे थे कि पार्टी के पुराने और निष्ठावान नेताओं की बजाय पसंद और समीकरण को अधिक महत्व दिया गया, जिसका खामियाजा पार्टी को इन चुनावों में भुगतना पड़ा है.