रांची से तन्वी झा की रिपोर्ट
रांची: 15 नवंबर 2000 को जब बिहार से अलग होकर झारखंड नया राज्य बना, तब लाखों युवाओं के मन में यह उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें अपने ही राज्य में रोजगार और प्रशासनिक सेवा में जाने के निष्पक्ष अवसर मिलेंगे. इसी उद्देश्य से वर्ष 2002 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय रांची में बनाया गया. आयोग की मुख्य जिम्मेदारी राज्य में पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से प्रशासनिक अधिकारियों की भर्ती करना था. हालांकि, अपनी स्थापना के कुछ ही समय बाद JPSC का इतिहास परीक्षाओं में देरी, OMR शीट में धांधली, नियमों में फेरबदल, सीबीआई-सीआईडी (CBI/CID) जांच और अदालती मुकदमों का पर्याय बन गया. जेपीएससी परीक्षा में अब तक हुए काले कारनामों को जानने के लिए प्रभात खबर ने छात्र नेता कुंदन राय से खास बातचीत की है. पढ़ें, छात्र नेता ने बातचीत में क्या कहा.
भ्रष्टाचार की नींव और सीबीआई (CBI) का शिकंजा
JPSC के इतिहास पर बात करते हुए छात्र नेता कुंदन राय ने कहा कि आयोग के कामकाज की शुरुआत ही भारी घोटालों और संस्थागत भ्रष्टाचार के साथ हुई, जिसने आयोग की निष्पक्षता पर पहला और सबसे बड़ा प्रहार किया. पहली और दूसरी सिविल सेवा परीक्षा में उत्तर पुस्तिकाओं (OMR शीट) में व्यापक पैमाने पर हेरफेर, फर्जी तरीके से नंबर बढ़ाने, OMR बदलने और रसूखदार नेताओं व अधिकारियों के रिश्तेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे. अभ्यर्थियों के भारी विरोध और उग्र आंदोलन के बाद यह मामला झारखंड हाई कोर्ट पहुंचा, जिसने निष्पक्ष जांच के लिए मामला सीबीआई (CBI) को सौंप दिया. सीबीआई की विशेष अदालत में JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष (डॉ. दिलीप प्रसाद), आयोग के सदस्यों, परीक्षा नियंत्रकों और फर्जी तरीके से चयनित कई अधिकारियों पर चार्जशीट दाखिल हुई, जिनमें से कई को जेल भी जाना पड़ा.
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लेट-लतीफी, प्रशासनिक शिथिलता की वजह से होती है देरी
छात्र नेता ने आगे कहा कि सीबीआई जांच और प्रशासनिक उथल-पुथल के कारण आयोग की कार्यप्रणाली पूरी तरह चरमरा गई और परीक्षाएं वर्षों तक टलती रही. जहां अन्य राज्यों में लोक सेवा आयोग हर साल परीक्षाएं आयोजित कर रहे था, वहीं JPSC में तीसरी और चौथी परीक्षा के नतीजे जारी होने के बाद भी कट-ऑफ और मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते रहे. 5वीं JPSC परीक्षा के दौरान न केवल OMR शीट में गड़बड़ी के आरोप लगे, बल्कि प्रारंभिक परीक्षा (PT) के रिजल्ट में आरक्षण और कट-ऑफ नियमों की अस्पष्टता ने विवाद को और बढ़ा दिया. नाराज अभ्यर्थी फिर अदालत पहुंचे, जिसके चलते पूरी भर्ती प्रक्रिया सालों तक अधर में लटकी रही और अंतिम नियुक्तियों में देरी हुई.
6th JPSC भी विवादों में रहा
छात्र नेता ने छठी JPSC के बारे में बात करते हुए बताया कि यह सिविल सेवा परीक्षा आयोग के इतिहास का सबसे चर्चित और विवादित मामला है. मुख्य परीक्षा (Mains) में आयोग ने अपने ही नियमों के विपरीत जाकर केवल अर्हता (Qualifying) वाले भाषा पत्र (हिंदी और अंग्रेजी के 100 अंक) के नंबरों को कुल मेरिट लिस्ट में जोड़ दिया. इस गलत फैसले से मुख्य मेरिट सूची पूरी तरह बदल गई, जिससे कई अयोग्य अभ्यर्थी क्वालीफाई कर गए और योग्य अभ्यर्थी चयन से बाहर हो गए. अभ्यर्थियों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जून 2021 में झारखंड हाईकोर्ट ने छठीं JPSC की मूल मेरिट लिस्ट को पूरी तरह रद्द कर दिया और आयोग को भाषा के अंक हटाकर नई मेरिट सूची जारी करने का आदेश दिया.
रिकॉर्ड समय में परीक्षा पूरी करने के दावों के बीच भी हुए प्रदर्शन
कुंदन राय ने सातवीं से 10वीं JPSC परीक्षा पर बात करते हुए बताया कि वर्षों से लंबित बैकलॉग को खत्म करने के लिए राज्य सरकार और आयोग ने एक साथ तीन सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने का फैसला लिया. आयोग ने रिकॉर्ड समय में प्रक्रिया पूरी करने का दावा किया, लेकिन प्रीलिम्स (PT) का रिजल्ट आते ही एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया. साहिबगंज, लोहरदगा और धनबाद के कुछ चुनिंदा परीक्षा केंद्रों से लगातार क्रमांक (Serial Roll Numbers) वाले दर्जनों अभ्यर्थी एक साथ पास घोषित हो गए. OMR गायब होने और धांधली के गंभीर आरोपों के बाद अभ्यर्थियों ने व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया, जिसके दबाव में आकर आयोग को बैकफुट पर आना पड़ा और संशोधित (Revised) रिजल्ट जारी करना पड़ा.
हाल के वर्षों में भी नहीं थमा धांधली का सिलसिला
छात्र नेता ने कहा कि हाल के वर्षों में भी आयोजित विभिन्न भर्ती परीक्षाओं (जैसे 14वीं जेपीएससी परीक्षा, सहायक वन संरक्षक/FRO व अन्य) में भी धांधली का सिलसिला नहीं थमा. परीक्षा संचालन में निजी एजेंसियों की संदिग्ध भूमिका, OMR शीट से छेड़छाड़ और वित्तीय लेन-देन के आरोप सामने आने के बाद सीआईडी (CID) ने मामले की कमान संभाली. सीआईडी की जांच में आयोग के पूर्व उच्च पदाधिकारियों, निजी एजेंसियों के प्रतिनिधियों और बिचौलियों के कथित सिंडिकेट द्वारा साक्ष्य मिटाने और भ्रष्टाचार में लिप्त होने के सुराग मिले. जिसके बाद जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल ख्यांग्ते और पूर्व परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता समेत कई बड़े अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. छात्र नेता कुंदन राय ने कहा है कि जब किसी राज्य की ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती हैं जहां आए दिन पेपर लीक होते रहे तो उस राज्य का युवा अपना मनोबल खोने लगता है. उनकी हिम्मत टूट जाती है. वे आगे कहते हैं कि जिस राज्य में राजनेता और अधिकारी अपने रिश्तेदार को सेट करने में लग जाएं और सीट बिकने लगे तो उस राज्य का विनाश तय है. राज्य सरकार को युवाओं और छात्रों के भविष्य को अंधेरे में ना डालते हुए उनके उज्जवल भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. उन्होंने सरकार से ये भी मांग की है कि वह कदाचार मुक्त परीक्षा संचालन और सेटिंग गेटिंग को रोकने के लिए कानून बनाएं. भविष्य में जो भी लोग इस कानून का उल्लंघन करते पकड़े जाएं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो ताकि आने वाले समय में छात्रों और युवाओं के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ ना हो. क्योंकि युवा इस देश की आने वाली पीढ़ी है. जो युवा आज दौड़ेगा वही आने वाले दौर को भी बदलेगा इस बात को राज्य सरकार याद रखें.
क्या कहती हैं प्रोफेसर फ़लक फ़ातिमा
इस पूरे मामले पर प्रेसिडेंट के हाथों सम्मानित होने वाली प्रोफेसर सह लेखिका फ़लक फ़ातिमा ने कहा कि झारखंड राज्य गठन के पीछे युवाओं को बड़ी उम्मीद थी कि उन्हें अपने ही राज्य में शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक सेवाओं में निष्पक्ष अवसर मिलेंगे. लेकिन वर्षों से जेपीएससी की विभिन्न परीक्षाओं को लेकर सामने आए विवाद, अनियमितताओं के आरोप, जांच और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं ने अभ्यर्थियों का समय, मेहनत और भविष्य प्रभावित किया है. मेरी स्पष्ट मांग है कि किसी भी परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में यदि अनियमितता या भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं, तो उसकी निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच होनी चाहिए. दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. साथ ही, इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक लाभ का माध्यम बनाने के बजाय इसे छात्रों और युवाओं के अधिकारों का मुद्दा रहने देना चाहिए. जो युवा वर्षों से परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल का हथियार नहीं बनना चाहिए. आज जरूरत है कि झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीकी रूप से मजबूत बनाई जाए, ताकि भविष्य में किसी भी अभ्यर्थी को अपनी मेहनत और अधिकार के लिए सड़कों या अदालतों का सहारा न लेना पड़े. हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ होनी चाहिए. झारखंड के युवाओं को न्याय के साथ साथ निष्पक्ष परीक्षा और भविष्य की सुरक्षा चाहिए. छात्रों की आवाज को सुना जाना चाहिए, दोषियों पर कार्रवाई हो और भर्ती व्यवस्था में ऐसी सुधार करें कि भविष्य में किसी युवा का भरोसा व्यवस्था से न टूटे.
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