वन भूमि के गैर वन संबंधी इस्तेमाल में झारखंड छठे स्थान पर, खनन और विकास की भेंट चढ़ गये 16 हजार हेक्टेयर जंगल

करीब पांच फीसदी वन भूमि झारखंड की है. वहीं, झारखंड में मौजूद कुल वन क्षेत्र के हिसाब से बीते 15 वर्षों में करीब 16 हजार हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग गैर वन कार्यों के लिए किया गया.

रांची, मनोज सिंह : वन भूमि का गैर वन संबंधी कार्यों में उपयोग करनेवाले शीर्ष छह राज्यों में झारखंड छठे स्थान पर है. पूरे देश में 15 वर्षों में करीब तीन लाख हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग गैर वन कार्यों (फॉरेस्ट डायवर्ट) के लिए किया गया. इसमें करीब पांच फीसदी वन भूमि झारखंड की है. वहीं, झारखंड में मौजूद कुल वन क्षेत्र के हिसाब से बीते 15 वर्षों में करीब 16 हजार हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग गैर वन कार्यों के लिए किया गया. भारत सरकार की ओर से जारी आकड़ों के मुताबिक, देश में सबसे अधिक वन भूमि डायवर्ट करनेवाले राज्य में सबसे ऊपर पंजाब है. यहां करीब 61,318 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग गैर वन कार्यों के लिए किया गया है. मध्य प्रदेश दूसरे और ओडिशा तीसरे स्थान पर है.

2008-09 से 2012-13 तक हुआ सबसे अधिक डायवर्ट

झारखंड में 2008-09 से 2012-13 तक राज्य में सबसे अधिक वन भूमि को डायवर्ट किया गया. इस दौरान करीब 9,444 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट की गयी. बाद के शासन काल में वन भूमि डायवर्ट करने की गति धीमी रही. 2018-19 में करीब 1,448 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट की गयी. अन्य वर्षों में 100 से लेकर 400 हेक्टेयर तक वन भूमि डायवर्ट की गयी थी.

झारखंड में करीब 23611 वर्ग किमी में वन

‘फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में करीब 23,611 वर्ग किमी में वन क्षेत्र है. अति सघन वन क्षेत्र करीब दो वर्ग किमी घटा है. सघन वन क्षेत्र दो वर्ग किमी के आसपास बढ़ा है. करीब 110 वर्ग किमी अन्य वन क्षेत्र बढ़ा है. यहां कुल भौगोलिक स्थिति का करीब 29 फीसदी भाग में वन भूमि है. हर साल यहां वन भूमि बढ़ रही है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

झारखंड के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) लाल रत्नाकर सिंह कहते हैं : झारखंड खनिज के मामले में संपन्न राज्य है. ज्यादातर खनिज वन भूमि में होता है. इसके खनन के लिए वन भूमि का डायवर्सन जरूरी है. यह विकास की जरूरत है. पर, ध्यान रखनी चाहिए कि जितनी वन भूमि डायवर्ट हो रही है. उससे अधिक पौधे लगाये जायें. सघन वन को बचाया जाये. जहां भी खनन का काम हो जा रहा है, उसको वन लगाकर विकसित किया जाये.

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क्या कहते हैं वनों को लेकर आंदोलन करनेवाले

वनों को लेकर संघर्ष करनेवाले जॉर्ज मोनोपॉली कहते हैं कि किसी भी सरकार की प्राथमिकता में जंगल का संरक्षण नहीं है. उद्योगों को देने के लिए वन भूमि तुरंत मिल जाती है. अगर में वनों में रहनेवाले उसके संरक्षण के लिए वन पर अधिकार मांगते हैं, तो नहीं मिलता है. झारखंड के लिए यह दुर्भाग्य है. यहां खनन भी वनों की क्षति का बड़ा कारण है. इसके स्थान पर वन कहां लगाया गया, यह नहीं दिखता है.

कब-कब कितना फॉरेस्ट डायवर्ट हुआ (हेक्टेयर में)

वर्ष भूमि

2008-09 2319.37

2009-10 442.83

2010-11 3027.52

2011-12 1888.87

2012-13 1768.96

2013-14 496.18

2014-15 659.43

2015-16 271.87

2016-17 119.02

2017-18 351.73

2018-19 1448.05

2019-20 865.36

2020-21 413.67

2021-22 739.99

2022-23 661.17

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By Prabhat Khabar News Desk

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