Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने रेल दुर्घटना में जान गंवाने वाले यात्री के परिजनों को बड़ी राहत देते हुए रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले को पलट दिया है. कोर्ट ने पूर्व रेलवे को मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. साथ ही दुर्घटना की तारीख 1 अगस्त 2017 से वास्तविक भुगतान तक सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी निर्देश दिया है. जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि मृतक एक वैध टिकटधारी यात्री था और उसकी मौत ट्रेन से गिरने के कारण हुई, जिसे रेलवे अधिनियम के तहत "अनटुवर्ड इंसीडेंट" माना जाएगा.
रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया था दावा
मामला देवघर जिले के मधुपुर निवासी स्वर्गीय अशोक मेहतो की मौत से जुड़ा है. उनकी पत्नी राजकुमारी देवी और चार बेटियों ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल, रांची में 8 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी. हालांकि 26 अप्रैल 2023 को ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि मामला रेलवे अधिनियम के तहत अनटुवर्ड इंसीडेंट की श्रेणी में साबित नहीं होता. इस फैसले को चुनौती देते हुए मृतक के परिजनों ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की.
वैध टिकट लेकर कर रहे थे यात्रा
अदालत में अपीलकर्ताओं की ओर से बताया गया कि 1 अगस्त 2017 को अशोक मेहतो ने जमुई से मधुपुर तक का वैध द्वितीय श्रेणी का टिकट खरीदकर दानापुर-टाटानगर एक्सप्रेस में यात्रा शुरू की थी. उन्होंने घर फोन कर लौटने की जानकारी भी दी थी. जब देर रात तक वह घर नहीं पहुंचे तो परिजनों ने खोजबीन शुरू की. इसी दौरान सूचना मिली कि नवापटरी के पास एक व्यक्ति ट्रेन से गिर गया है. मौके पर पहुंचने पर परिजनों ने शव की पहचान अशोक मेहतो के रूप में की. घटना के बाद मधुपुर जीआरपी में यूडी केस दर्ज किया गया. पुलिस की जांच, पंचनामा और अंतिम रिपोर्ट में भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि मृतक की मौत चलती ट्रेन से गिरने के कारण हुई थी. मृतक के पास से यात्रा का वैध टिकट भी बरामद हुआ था.
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल की दलीलों को नहीं माना
रेलवे की ओर से दलील दी गई कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और मृतक का शव रेलवे ट्रैक से करीब 10 मीटर दूर मिला था. इसलिए यह साबित नहीं होता कि उसकी मौत ट्रेन से गिरने के कारण हुई. हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि केवल शव का ट्रैक से कुछ दूरी पर मिलना इस बात का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता कि व्यक्ति ट्रेन से नहीं गिरा. तेज गति से चलती ट्रेन से गिरने पर शव दूर जाकर गिर सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि हर रेल टिकट खरीदने का कोई प्रत्यक्षदर्शी होना आवश्यक नहीं है. जब पुलिस रिकॉर्ड और जांच में टिकट की पुष्टि हो चुकी है तो मृतक को वैध यात्री मानने में कोई संदेह नहीं है.
रेलवे अधिनियम की लाभकारी भावना का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि रेलवे अधिनियम की मुआवजा संबंधी व्यवस्था एक लाभकारी कानून है, जिसकी संकीर्ण नहीं बल्कि उदार व्याख्या की जानी चाहिए. कोर्ट ने माना कि यह मामला रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(सी)(2) और धारा 124-ए के तहत अनटुवर्ड इंसीडेंट की श्रेणी में आता है. इसलिए रेलवे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता.
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दो माह में भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए पूर्व रेलवे को निर्देश दिया कि मृतक के परिजनों को 8 लाख रुपये मुआवजा और 1 अगस्त 2017 से वास्तविक भुगतान तक सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज दो माह के भीतर अदा किया जाए. इसके साथ ही अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया.
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