Hul Special: 7 जुलाई, 1855 : इतिहास के पन्नों में दर्ज वह तारीख है, जब अमर शहीद सिदो-कान्हू के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने दीघी थाना के दारोगा महेश लाल दत्त को सरेआम मौत की सजा दी थी. इसी के साथ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुले संघर्ष का शंखनाद हुआ था. इससे ठीक पहले, 30 जून, 1855 को सिदो-कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में साहिबगंज के भोगनाडीह से शोषण, महाजनी और जमींदारी प्रथा के खिलाफ 'हूल' का बिगुल फूंका जा चुका था.
अंग्रेजों ने बलपूर्वक इस आंदोलन को दबा भले ही दिया, लेकिन इसी विद्रोह की धधकती आग के कारण ब्रिटिश सरकार को 'संथाल परगना' नाम से एक नये गैर-विनियमित जिले का गठन करना पड़ा. यहीं से वह वैचारिक जमीन तैयार हुई, जिस पर आगे चलकर दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा व अन्याय के खिलाफ महासंग्राम छेड़ा और अंततः पृथक झारखंड राज्य का सपना साकार हुआ. सिदो-कान्हू ने जो चिंगारी सुलगाई थी, गुरुजी ने उसे मशाल बनाकर आदिवासियों-मूलवासियों को अपने जल, जंगल और जमीन के हक के लिए लड़ना सिखाया.
आज दौर बदल चुका है, मगर चुनौतियां कम नहीं हुई हैं. कोई बच्चा गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित न रहे, कोई इलाज के अभाव में दम न तोड़े, किसी मेहनतकश की हकमारी न हो और अपराध किसी का चैन न छीने... इन तमाम विसंगतियों के खिलाफ आज भी हूल जारी है..
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