सीएनटी जमीन का मामला: झारखंड हाईकोर्ट ने 1988 में दिए गए एसएआर अधिकारी के आदेश को माना वैध

झारखंड हाईकोर्ट ने सीएनटी भूमि से जुड़े एक आठ दशक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने 19 साल बाद शुरू की गई एसएआर कार्यवाही को अवैध करार देते हुए 1988 के मूल आदेश को वैध माना है.

CNT News: झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने रांची जिले से जुड़े करीब आठ दशक पुराने सीएनटी भूमि से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने 19 वर्ष बाद दोबारा शुरू की गई एसएआर कार्यवाही को अवैध करार दिया है. अदालत ने कहा कि जिस मामले का पहले ही निपटारा हो चुका हो और उसका आदेश अंतिम रूप ले चुका हो, उसे लंबे अंतराल के बाद दोबारा नहीं खोला जा सकता. यह मामला रांची जिले के चान्हो स्थित खाता संख्या-41, प्लॉट संख्या-610 की 1.32 एकड़ जमीन से जुड़ा है. सुनवाई में अदालत ने पाया कि वर्ष 1988 के आदेश के खिलाफ कभी कोई कानूनी चुनौती नहीं दी गई थी. 

एसएआर अधिकारी का आदेश वैध

अदालत के आदेश के अनुपालन में सितंबर 1988 में रजिस्टर्ड सेल डीड निष्पादित हुई और संबंधित जमीन का नामांतरण (म्यूटेशन) भी कर दिया गया. इस आदेश को उस समय किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई, जिससे वह अंतिम रूप ले चुका था. दूसरी एसएआर कार्यवाही पहली कार्यवाही के लगभग 19 वर्ष बाद शुरू की गई. जस्टिस द्विवेदी ने फैसले में कहा कि 40 से 50 वर्ष बाद पुराने मामलों को दोबारा खोलना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता. अदालत ने 28 जून 2008 को अतिरिक्त समाहर्ता द्वारा पारित आदेश और 21 अक्टूबर 2008 को प्रमंडलीय आयुक्त के पुनरीक्षण आदेश को निरस्त कर दिया. अदालत ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि 26 अगस्त 1988 को पारित एसएआर अधिकारी का आदेश पूरी तरह वैध है और उसी को अंतिम माना जायेगा. इसके साथ ही अदालत ने प्रार्थी की रिट याचिका स्वीकार कर ली. प्रार्थी अमर कुमार चौधरी ने रिट याचिका दायर की थी. 

यह है पूरा मामला

इस मामले में प्रार्थी अमर कुमार चौधरी के पिता ने वर्ष 1947 में संबंधित जमीन तत्कालीन रैयत कुसल कुजूर व अन्य लोगों से 2,500 रुपये में खरीदी थी. हालांकि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति नहीं मिलने से बिक्री की औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, लेकिन परिवार का लगातार जमीन पर कब्जा रहा. बाद में 1962 में विवाद उत्पन्न होने पर टाइटल सूट दायर किया गया, जिसका वर्ष 1965 में समझौते के आधार पर निपटारा हो गया. इसके बाद वर्ष 1986-87 में पहली बार एसएआर मामला दायर हुआ. 26 अगस्त 1988 को एसएआर अधिकारी ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के पिता उसी गांव में समान क्षेत्रफल की दूसरी जमीन प्रतिवादी के पक्ष में हस्तांतरित करें. अदालत के आदेश के अनुपालन में सितंबर 1988 में रजिस्टर्ड सेल डीड बनी और संबंधित जमीन का नामांतरण (म्यूटेशन) भी कर दिया गया. इस आदेश को उस समय किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी गयी, जिससे वह अंतिम रूप ले चुका था. वर्ष 2006 में प्रतिवादी पक्ष ने फिर से एसएआर केस-13/2006-07 दायर किया. हालांकि एसएआर अधिकारी ने इसे पहले से निष्पादित मामला मानते हुए खारिज कर दिया. इसके बाद एडिशनल कलेक्टर ने अपील स्वीकार करते हुए न सिर्फ वर्ष 2007 के आदेश, बल्कि वर्ष 1988 के मूल आदेश को भी रद्द कर दिया. बाद में प्रमंडलीय आयुक्त ने भी इस फैसले को बरकरार रखा. प्रार्थी ने इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी.

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Published by: Sweta Vaidya

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