Azadi Ka Amrit Mahotsav: नागरमल ने मौलाना आजाद के साथ मिलकर चलाया आंदोलन

हम आजादी का अमृत उत्सव मना रहे हैं. भारत की आजादी के लिए अपने प्राण और जीवन की आहूति देनेवाले वीर योद्धाओं को याद कर रहे हैं. झारखंड की माटी ऐसे आजादी के सिपाहियों की गवाह रही है.

By Prabhat Khabar Digital Desk | August 12, 2022 9:43 AM

नागरमल पर शोधकर्ता सुधीर लाल की जुबानी, पूरी कहानी.

Azadi Ka Amrit Mahotsav: छोटानागपुर क्षेत्र में कई स्वतंत्रता सेनानियों ने आंदोलन का नेतृत्व किया. इनमें से एक चर्चित नाम स्वर्गीय नागरमल मोदी का है. राजस्थान के मंडावा में 20 अप्रैल 1878 को इनका जन्म हुआ. पिता भीमराज मोदी 1868 में रांची में व्यापार के सिलसिले में पहुंचे थे. इन्होंने ही झारखंड (तत्कालीन बिहार) में बैंकिंग सिस्टम की शुरुआत की थी. नागरमल माेदी जब 14 वर्ष (1892) के थे, तब आर्य समाज के प्रचारकों के संपर्क में आये. अप्रैल 1894 में रांची आर्य समाज की स्थापना हुई और नागरमल इससे जुड़ गये.

मारवाड़ी समाज को सुधारने में जुटे थे नागरमल

1898 तक समर्पित भाव से जुड़कर समाज की विकृतियों खास कर मारवाड़ी समाज को सुधारने में जुट गये, इससे समाज में उनकी अलग पहचान बनी. कई लोगों ने नागरमल के विचारधारा का विरोध किया और पिता से शिकायत कर दी. तब पिता भीमराज ने नागरमल को कोलकाता में अपनी नयी शाखा ‘भीमराज भूरामल’ भेज दिया. यहां पहुंचकर नागरमल आर्य समाज से जुड़ गये. 20 युवाओं को संगठित कर समाज सुधार, देश की स्वतंत्रता और वेद की प्रतिष्ठा जैसे बिंदुओं पर काम करने लगे.

असहयोग आंदोलन को छोटानागपुर में बढ़ावा दिया

1914-15 के बीच नागरमल की घनिष्ठता मौलाना आजाद से हुई. 1916 में मौलाना आजाद को जब बंगाल से निष्कासित कर दिया गया, तब नागरमल मोदी और गणपत राय बुधिया ने इनके नजरबंद रहने की व्यवस्था की. नागरमल 1920 तक रांची में रहे और जामा मस्जिद में तकरीर के बाद क्रांतिकारियों से मिलते थे. देश में असहयोग आंदोलन छिड़ चुका था. नागरमल मोदी ने रांची में असहयोग आंदोलन का नेतृत्व करते हुए 17 से 21 नवंबर तक हड़ताल की घोषणा कर दी. कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपत राय ने छोटानागपुर में टाना भगतों के हिंसक आंदोलन को समझने के लिए राजेंद्र प्रसाद को भेजा.

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नमक सत्याग्रह आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन का किया नेतृत्व

नागरमल मोदी और राजेंद्र प्रसाद ने टाना भगतों से मुलाकात की और उन्हें कांग्रेस के मंच से जुड़कर गांधीजी के अहिंसा के मार्ग पर चलने का आग्रह किया. इसके बाद से टाना भगत और नागरमल मोदी पूरे छोटानागपुर में आदिवासी संगठनों को असहयोग आंदोलन से जोड़ने लगे. इसकी रिपोर्ट डीएसपी सीआइडी ने रांची डीसी को भेजी (दिल्ली नेशनल अर्काइव में रिपोर्ट मौजूद है). इसके आधार पर नागरमल को गिरफ्तार कर लिया गया और ढाई वर्ष की सजा के साथ 100 रुपये का दंड लगाया गया. जेल से निकलने के बाद नागरमल नजरबंद रहने लगे. इसके बाद 1930 में ‘नमक सत्याग्रह आंदोलन’ का और 1932 में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का नेतृत्व किया.

बम बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले खास कपड़े को भगत सिंह तक पहुंचाया

इस बीच नागरमल दोबारा गिरफ्तार हुए और उन्हें डेढ़ वर्ष की सजा हुई. पहले केंद्रीय कारागार रांची में रखा गया, फिर हजारीबाग और फिर सजा पूरी करने के लिए पटना जेल भेज दिया गया. जेल में नागरमल की मुलाकात भगत सिंह के चाचा अजित सिंह से हुई. बम बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले खास कपड़े का लाइसेंस नागरमल के पास ही था. इस कपड़े को गुप्त रूप से भगत सिंह तक पहुंचाया गया. इन्हीं कपड़ों से बम तैयार कर भगत सिंह ने बम कांड किया था और वेष बदलकर कोलकाता पहुंचे थे.

1934 में गांधी जी से मिले

1934 में गांधी जी रांची पहुंचे थे. जेल से निकलने के बाद नजरबंद रह रहे नागरमल ने गांधी से मुलाकात की. अपर बाजार के बाजार टांड़ में मारवाड़ियों के बीच सभा हुई और इसका नेतृत्व नागरमल मोदी कर रहे थे.1940 में रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन हुआ. यहां राजेंद्र प्रसाद ने ‘अादिम जाति सेवा मंडल’ का नेतृत्व करने के लिए नागरमल मोदी को जिम्मेदारी सौंपी.

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1946 में अंतरिम सरकार के विधायक चुने गये

रांची में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व करते हुए नागरमल मोदी ने 09 अगस्त 1942 के दिन रांची में हड़ताल करने की घोषणा की. आंदोलन पूरे छोटानागपुर में फैल गया. 1946 में अंतरिम सरकार (इंट्रीव गवर्मेंट) बनी. इसमें नागरमल मोदी दूसरी बार गुमला-सिमडेगा निर्वाचन क्षेत्र के विधायक चुने गये (पहली बार 1937 में). इसके बाद रांची कांग्रेस के कोषाध्यक्ष भी रहे. अस्वस्थ रहने के बाद भी लगातार छोटानागपुर क्षेत्र में घूम-घूम कर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार करते रहे. 1952 में वे गंभीर रूप से अस्वस्थ रहने लगे. इसके बाद सर गंगा राम से प्रेरित होकर ‘नागरमल मोदी ट्रस्ट’ तैयार किया. ट्रस्ट के अंतर्गत अपनी सभी संपत्ति दान कर दी. इसके कुछ माह बाद चार सिंतबर 1953 को स्थिति बिगड़ने पर उनका निधन हो गया.


रिपोर्ट : अभिषेक रॉय.

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