महानायक बुधू भगत के गांव को है रहनुमा का इंतजार

चान्हो : 1832 के कोल विद्रोह के महानायक अमर शहीद वीर बुधू भगत के वंशजों को आज भी रहनुमा का इंतजार है. चान्हो प्रखंड के सिलागाईं में अमर शहीद भगत की तीसरी पीढ़ी के 19 परिवार के लोग तंगहाली में जी रहे हैं. किसी तरह खेतीबारी कर गुजर बसर कर रहे हैं. अलग राज्य के […]

चान्हो : 1832 के कोल विद्रोह के महानायक अमर शहीद वीर बुधू भगत के वंशजों को आज भी रहनुमा का इंतजार है. चान्हो प्रखंड के सिलागाईं में अमर शहीद भगत की तीसरी पीढ़ी के 19 परिवार के लोग तंगहाली में जी रहे हैं. किसी तरह खेतीबारी कर गुजर बसर कर रहे हैं. अलग राज्य के गठन के बाद झारखंड में सत्तासीन हुए तमाम सरकारों ने इनकी दशा व दिशा सुधारने के वादे किये. घोषणाएं भी की, पर किसी ने इनकी सुध नहीं ली. अब उन्हें उम्मीद है कि नयी सरकार में उनके दिन बहुरेंगे.

इनके वंशजों को सरकार की तरफ से एक आवास तक नहीं मिला है. जिसके चलते वे आज भी एक टूटे हुए मकान में रहते हैं. इन्हीं वंशजों में से एक लक्ष्मीनारायण भगत का कहना है कि वे खेतीबारी के अलावा मजदूरी कर अपने छह सदस्यीय परिवार का पेट पाल रहे हैं. सरकार चाहेगी तो वे कहीं झाड़ू पोंछा का भी काम कर सकते हैं.
इस परिवार की ही वृद्धा शनिचरिया भगत ने कहा कि सरकार को शहीद के वंशजों के उत्थान के लिए काम करना चाहिए. उनके परिवार में मैट्रिक व इंटर पास हैं. इन्हें योग्यता के अनुसार, कोई काम मिलता, तो बेहतर होता. इसी परिवार के वंशज वीरेंद्र भगत का कहना है कि झारखंड में जितनी भी सरकारें आयी हैं, सबने वीर बुधू भगत के नाम पर सिर्फ राजनीति की.
यहां हर साल जयंती समारोह के अवसर पर उनके वंशजों को स्टेज में बुलाकर धोती व शॉल देकर सम्मानित किया जाता है. इससे किसी का भला नहीं होनेवाला है. शहीद के वंशजों का भला करना है, तो उनके लिए सरकार को धरातल पर ठोस काम करना होगा. वीर बुधू भगत के ही परपोते शिवपूजन भगत का कहना है कि झारखंड अलग राज्य बने दो दशक बीत चुके हैं.
यहां जितनी भी सरकारें आयीं, सभी ने वीर बुधू भगत के वंशजों को सिर्फ आश्वासन देने का काम किया. उन्होंने बताया कि झारखंड अलग राज्य के गठन के बाद से अब तक के तमाम राज्यपाल व मुख्यमंत्री को मांग पत्र दे चुके हैं. जिसका परिणाम अब तक तो शून्य ही है. वे खुद एमए तक की पढ़ाई कर चुके हैं. उनकी पत्नी ललिता भगत बीएड व टेट उत्तीर्ण है, इसके बाद भी उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी नहीं मिली है.
सिदो-कान्हू के वंशजों की तर्ज पर मॉडल आवास देने की उनकी मांग को भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है. इस परिवार की ही आरती भगत बताती हैं कि छह माह पहले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास उनके पैतृक आवास आये थे. आवास में स्थित वीर बुधू भगत की पिंडी स्थल पर उन्होंने टाइल्स लगाने का आश्वासन दिया था. लेकिन वह काम भी पूरा नहीं हुआ है.
आबादी 4500, न सड़क, न अस्पताल
अमर शहीद वीर बुधू भगत के पैतृक गांव सिलागाईं तक जाने के लिए आज तक पक्की सड़क नहीं बन सकी है. चान्हो प्रखंड मुख्यालय से गांव तक जानेवाले मुख्य पथ चलने लायक नहीं है.
ग्रामीणों की मांग पर पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 17 फरवरी 2018 को वीर बुधू भगत की जयंती समारोह में पहली बार व चार नवंबर 2018 को सिलागाईं के जन चौपाल में दूसरी बार सड़क निर्माण कार्य एक माह में शुरू कराने की घोषणा सार्वजनिक तौर पर की थी. इसके बाद भी सड़क नहीं बनी. हर साल 17 फरवरी को सिलागाईं में वीर बुधू भगत की जयंती समारोह को लेकर इस सड़क को किसी तरह चलने लायक बनाया जाता है.
स्थानीय प्रशासन की ओर से युद्धस्तर पर रातोंरात गड्ढे भरे जाते हैं. आदिवासी बहुल करीब साढ़े चार हजार की आबादी वाले गांव में अधिकांश लोग खेतीबारी पर ही निर्भर हैं. गांव में सिंचाई के साथ पेयजल सुविधा का अभाव है. गांव में एक साल पहले चार जलमीनार बनी थी, जो बोरिंग फेल होने से बेकार पड़ा है.
कोईल नदी से लिफ्ट इरिगेशन के माध्यम से गांव में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने व सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोर बनाने की ग्रामीणों की मांग भी अब तक पूरी नहीं हुई है. गांव में स्वास्थ्य सुविधा का भी टोटा है. स्मारक समिति के लोग यहां 100 बेड का अस्पताल बनाने का भी मांग करते रहे हैं.
बुधू भगत के वंशज कहते हैं कि 17 फरवरी को हर वर्ष गांव में लाखों रुपये खर्च कर सरकारी तामझाम से वीर बुधू भगत की जयंती मनायी जाती है. इसमें मुख्यमंत्री, मंत्री शामिल होते रहे हैं. वीर बुधू भगत व वंशजों के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन मिलता कुछ नहीं है.
गांव तक पहुंचने के लिए आज तक पक्की सड़क तक नहीं बनायी जा सकी है. जलापूर्ति के लिए जलमीनारों का निर्माण किया गया. लेकिन पानी नहीं निकलता है. बनने के बाद से ही सभी बेकार पड़ी हैं.
गांव में न सड़क है, न अस्पताल, पीने के पानी के लिए भी तरसते हैं लोग
शहीद भगत की तीसरी पीढ़ी के 19 परिवारों के लोग खेतीबारी व मजदूरी पर निर्भर हैं. सरकार की ओर से उन्हें कोई सुविधा अब तक नहीं मिली है. घर बनाने के लिए भी पैसे नहीं मिले हैं. इस कारण टूटे-फूटे मिट्टी के घर में रहने को विवश हैं.
वीर बुधू भगत के पैतृक गांव तक जाने के लिए आज तक पक्की सड़क नहीं बन सकी है. हर साल 17 फरवरी को सिलागाईं में वीर बुधू भगत की जयंती समारोह को लेकर सड़क को किसी तरह चलने लायक बनाया जाता है. इस बार भी वही हो रहा है.
बोले वंशज
परपोता लक्ष्मीनारायण भगत बोले
सरकारी सुविधाएं तो दूर आवास तक नहीं मिला, टूटे घर में कर रहे गुजर बसर, सरकार चाहेगी तो झाड़ू पोंछा का भी कर सकते हैं काम
वंशज वीरेंद्र भगत बोले
हर साल जयंती समारोह में वंशजों को धोती व शॉल देकर सम्मानित किया जाता है, इससे हमारा भला नहीं होनेवाला
वृद्धा शनिचरिया भगत बोली
परिवार में मैट्रिक व इंटर पास लोग हैं, इन्हें योग्यता के अनुसार, कोई काम मिलता, तो बेहतर होता

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >