आगमन का पुण्यकाल-17 : जीवन की प्राथमिकताओं पर चिंतन करें

कॉलेज छोड़ने के कई वर्षों बाद कुछ पुराने मित्र मिले और उन्होंने अपने कॉलेज के एक प्रोफेसर से मिलने की सोची. वे उनके घर गये. प्रोफेसर ने उनका स्वागत किया. सभी पुरानी यादों को ताजा करने लगे. प्रोफेसर ने सभी से उनकी जिंदगी व करियर के बारे में पूछा. सभी ने यही कहा कि वे […]

कॉलेज छोड़ने के कई वर्षों बाद कुछ पुराने मित्र मिले और उन्होंने अपने कॉलेज के एक प्रोफेसर से मिलने की सोची. वे उनके घर गये. प्रोफेसर ने उनका स्वागत किया. सभी पुरानी यादों को ताजा करने लगे. प्रोफेसर ने सभी से उनकी जिंदगी व करियर के बारे में पूछा. सभी ने यही कहा कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा कर रहे हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई के समय की जिंदगी वर्तमान से कहीं ज्यादा अच्छी थी. उस समय इतना तनाव और काम का दबाव नहीं था़
प्रोफेसर ने सभी के लिए एक केतली में चाय मंगवायी और अपने छात्रों से कहा कि वे अपने लिए रसोई से कप ले आये़ं रसोई में महंगे-सस्ते कई तरह के कप रखे थे. छात्रों ने अपनी पसंद का कप उठाया और प्रोफेसर के पास आ गये. जब सभी ने चाय पी ली, तब प्रोफेसर ने कहा- ‘मैं आप लोगों को आपके जीवन की एक सच्चाई बताता हूं. आप सभी रसोई में से सबसे महंगे और सुंदर दिखने वाले कप उठाकर लाये.
वहां साधारण व सस्ते कप भी थे, लेकिन आपने उन्हें नहीं लाया़ अब ज्ञान की बात यह है कि कप का उद्देश्य चाय को रखना होता है. महंगे और अच्छे दिखने वाले कप चाय को अधिक स्वादिष्ट नहीं बनाते. चाय अच्छी होनी चाहिए, कप जैसा भी हो. हमारी जिंदगी चाय की तरह होती है और नौकरी, पैसा और समाज में इज्जत आदि इन कप की तरह होते हैं. नौकरी और पैसा जीवन जीने के लिए आवश्यक है लेकिन यह जीवन नहीं है़
कभी-कभी हम अधिक महंगे और अच्छे दिखने वाले कप के चक्कर में ‘चाय’ को भूल जाते हैं. जिस तरह चाय का स्वादिष्ट होना कप पर नहीं, बल्कि चाय की गुणवत्ता और चाय बनाने के तरीके पर निर्भर है, उसी तरह हमारे जीवन में खुशियां भी पैसों पर नहीं बल्कि हमारे संस्कारों और हमारे जीवन जीने के तरीके पर निर्भर करती है. आगमन काल में जीवन की प्राथमिकताओं पर चिंतन करे़ं
-फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक

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