रांची : कई बार इसकी संभावना बनी रहती है कि सरकारी एंबुलेंस (108) से मरीज को पास के सरकारी अस्पताल पहुंचाने के बजाय उसे किसी निजी या दूर के सरकारी अस्पताल तक पहुंचा दिया जाये. इलाज के लिए पर्याप्त सुविधा वाले निचले स्तर के सरकारी अस्पताल के बजाय मरीज को अपेक्षाकृत दूर स्थित जिला अस्पताल या किसी मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल पहुंचाने के मामले भी होते हैं.
एेसी किसी संभावना या जरूरत के लिए होने वाले इंटर फैसिलिटी ट्रांसफर (अस्पताल बदलने) के लिए एनएचएम ने शर्त (प्रोटोकॉल) तय कर दी है. अब तय शर्त के मुताबिक ही एंबुलेंस संचालकों को इंटर फैसिलिटी ट्रांसफर के संबंध में निर्णय लेना होगा. कोई दुर्घटना या अापात स्थिति के दौरान कई बार यह होता है कि निर्णय लेने में जल्दबाजी होती है.
इससे निबटने के लिए एनएचएम ने एक चार्ट तैयार किया है, जिसके आधार पर किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाने से पहले एंबुलेंस चालक व अटेंडेंट (इमरजेंसी मेडिकल टेक्निशयन या इएमटी) को निर्णय लेने में आसानी होगी.
क्या है प्रोटोकॉल (शर्त) : मरीज को निजी अस्पताल या दूसरे रेफरल अस्पताल ले जाने (इंटर फैसिलिटी ट्रांसफर) के लिए मेडिकल अफसर की सहमति जरूरी है, जो मरीज की नाजुक स्थिति तथा संबंधित अस्पताल में अपर्याप्त मेडिकल सुविधा को आधार बनाकर तथा मेडिकल सुपरिटेंडेंट की राय लेकर यह सहमति देंगे.
नजदीकी सरकारी अस्पताल में मरीज को एडमिट किये बगैर डॉक्टर व अन्य हेल्थ स्टाफ की अनुपस्थिति बता कर किसी अन्य अस्पताल में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है. एडमिट करने के बाद ऐसी स्थिति हो, तो पास के दूसरे सरकारी अस्पताल ले जाना है. पर सर्विस प्रोवाइडर (एंबुलेंस संचालक) को ऐसे मामले का पूरा रिकॉर्ड रखना होगा.
इन मामलों में ट्रांसफर फैसिलिटी का निर्णय ले सकते हैं
हृदयाघात, आइसीयू या एसएनसीयू के मरीज, बर्न केस, गंभीर चोट, आसन्न प्रसव, हेड-नेक व स्पाइनल इंज्यूरी.
