विवेक चंद्र, रांची : कोल कंपनियों के पास राजस्व के हजारों करोड़ रुपये पड़े होने के बावजूद राज्य सरकार को हर साल आरबीआइ से औसतन सात हजार करोड़ रुपये कर्ज लेना पड़ता है. वित्तीय वर्ष 2018-19 में झारखंड सरकार ने करीब आठ हजार रुपये कर्ज लिए थे. उसके पहले वित्तीय वर्ष 2017-18 में भी सात हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि राज्य को कर्ज के रूप में लेनी पड़ी थी.
कोल कंपनियों के पास पड़े हैं राजस्व के हजारों करोड़ सरकार को हर साल सात हजार करोड़ लेना पड़ता है कर्ज
विवेक चंद्र, रांची : कोल कंपनियों के पास राजस्व के हजारों करोड़ रुपये पड़े होने के बावजूद राज्य सरकार को हर साल आरबीआइ से औसतन सात हजार करोड़ रुपये कर्ज लेना पड़ता है. वित्तीय वर्ष 2018-19 में झारखंड सरकार ने करीब आठ हजार रुपये कर्ज लिए थे. उसके पहले वित्तीय वर्ष 2017-18 में भी सात […]

वित्तीय वर्ष 2019-2020 में राज्य सरकार को आर्थिक तंगी से निबटने के लिए कर्ज लेने की जरूरत पड़ गयी है. चालू वित्तीय वर्ष में आरबीआइ से कर्ज लेने की शुरुआत लगभग 1,500 करोड़ रुपये से हो रही है. संभवत: जुलाई में आरबीआइ के ऑक्शन में राज्य सरकार कर्ज मांगेगी.
80,000 करोड़ से अधिक है कर्ज का बोझ : उल्लेखनीय है कि राज्य गठन के बाद से राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ लगभग 80,000 हजार करोड़ रुपये हो गया है. यह राज्य की कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 25 प्रतिशत है. जबकि, किसी भी समृद्ध राज्य के लिए कुल जीडीपी के तीन प्रतिशत से अधिक कर्ज नहीं होना चाहिए. इससे अधिक कर्ज लेनेवाले राज्य विकास की दौड़ में सबसे पिछड़े राज्य माने जाते हैं.
2018-19 में झारखंड सरकार ने करीब आठ हजार रुपये कर्ज लिए थे
2017-18 में भी सात हजार करोड़ से अधिक की राशि लेनी पड़ी थी
कोल कंपनियों से बकाया राशि मांगने के लिए राज्य सरकार ने कई प्लेटफॉर्म पर अपनी बात रखी है. नीति आयोग और कोल इंडिया का ध्यान भी इस ओर दिलाया गया है. निश्चित रूप से कंपनियों से बकाया राजस्व मिलने पर सरकारी खजाना ज्यादा समृद्ध होगा और उसका लाभ राज्य को मिलेगा.
– सुखदेव सिंह, विकास आयुक्त, झारखंड
नोटिस का जवाब नहीं देती कोल कंपनियां
कोल कंपनियां लगान की राशि देने के लिए राज्य सरकार द्वारा दिये गये नोटिस का जवाब नहीं देती हैं. भू-राजस्व विभाग के निर्देश पर संबंधित अंचलों द्वारा गैरमजरूआ सरकारी भूमि पर खनन कार्य करने के लिए कई बार बकाया लगान और सेस की मांग की गयी है. लेकिन, कोयला कंपनियों ने लगान चुकाने या जवाब देने की दिशा में कोई कार्यवाही नहीं की. राज्य सरकार द्वारा राज्य में खनन कार्य करने वाली कोल कंपनियों से बकाया राशि दिलाने के लिए केंद्र सरकार, कोल इंडिया और नीति आयोग से भी आग्रह किया है.
कोयला खनन बंद कराया, तो देश में मच जायेगा हाहाकार
झारखंड देश में कोयला आपूर्ति का सबसे बड़ा केंद्र है. राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश का 60 फीसदी कोयला का उत्पादन झारखंड करता है. कोयला कंपनियों द्वारा लगान की राशि नहीं देने पर राज्य सरकार 50,000 एकड़ से अधिक सरकारी भूमि पर खनन बंद करा सकती है. लेकिन, उससे देश भर में हाहाकार मच जायेगा.
यही वजह है कि राज्य सरकार 33,000 करोड़ से अधिक राजस्व बकाया होने के बावजूद सरकारी भूमि पर खनन कार्य बंद नहीं करा रही है. दूसरी तरफ कोल कंपनियां इसी बात का फायदा उठा रही हैं. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल और ओड़िसा में कोल कंपनियों ने खनन के लिए इस्तेमाल की जा रही सरकारी भूमि के बदले राजस्व सरकारी खजाने में जमा कराया है.