रांची : दूधिनाला में है 30 करोड़ वर्ष पुराना पत्थर, खान विभाग चाहता है जियोलॉजिकल हेरीटेज बनाना
सुनीलचौधरी, रांची : हजारीबाग जिला की सीमा पर स्थित जरवा दूधिनाला में 30 करोड़ वर्ष पुराना पत्थर है. ये पत्थर गवाह है पृथ्वी की उत्पत्ति का. जानकार इसे हिम युग (ग्लेशियर एज) का पत्थर बताते हैं. यहां पिछले 50 वर्षों से भूतत्व वैज्ञानिक, भूगर्भशास्त्र के छात्र और शोधकर्ता शोध करने आते हैं और पृथ्वी के […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
सुनीलचौधरी, रांची : हजारीबाग जिला की सीमा पर स्थित जरवा दूधिनाला में 30 करोड़ वर्ष पुराना पत्थर है. ये पत्थर गवाह है पृथ्वी की उत्पत्ति का. जानकार इसे हिम युग (ग्लेशियर एज) का पत्थर बताते हैं. यहां पिछले 50 वर्षों से भूतत्व वैज्ञानिक, भूगर्भशास्त्र के छात्र और शोधकर्ता शोध करने आते हैं और पृथ्वी के बनने की प्रक्रिया पर शोध करते हैं.
यह पत्थर जरवा गांव दूधी नदी पर है. यह पत्थर हिमयुग का गवाह है और बताता है कि कभी इस क्षेत्र में भी ग्लेशियर हुआ करता था. अब खान एवं भूतत्व विभाग ने सरकार को पत्र लिख कर इसे जियोलॉजिकल हेरीटेज के रूप में विकसित करने की अनुशंसा की है. विभाग का कहना है कि यहां रेयर जियोलॉजिकल फीचर है, जो पूरी दुनिया के लिए अध्ययन का केंद्र बना हुआ है. ऐसे में इसका संरक्षण जरूरी है. यहां ऐसी सुविधाएं हो कि शोधकर्ता यहां शोध करें. एक प्रकार का पर्यटन केंद्र भी बनाने का सुझाव दिया गया है.
क्या है खासियत: दूधिनाला के आसपास बिखड़े हुए ये पत्थर कई मायनों में अलग हैं. वैज्ञानिक बताते हैं कि यह धरती की उत्पत्ति के समय का ही है. इसकी आयु लगभग 30 करोड़ वर्ष की बतायी जा रही है. उस समय धरती पर हिमयुग था. यानी चारों तरफ बर्फ और ग्लेशियर ही. मानव सभ्यता की उत्पत्ति के पहले का यह माना जाता है. यह एक प्रकार सेडिमेंटेड तालचर फॉरमेशन का रॉक है.
पेयजल विभाग ने कर दी थी खुदाई
हाल ही में पेयजल विभाग द्वारा वहां चेकडैम बनाने के नाम पर खुदाई कर दी गयी थी, जिसका सोसाइटी अॉफ जियो साइंटिस्ट ने कड़ा विरोध किया. विनोबा भावे विश्वविद्यालय के छात्र व शिक्षकों ने विरोध किया. जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की. इसके बाद हजारीबाग जिला प्रशासन ने 15 जनवरी से वहां किसी तरह के निर्माण व खुदाई पर रोक लगा दी है. पेयजल विभाग को साइट से 300 मीटर दूर अलग जगह पर चेकडैम बनाने का विकल्प दिया गया है.
जीएसआइ ने भी संरक्षित करने की बात कही : जियोलॉजिकल सर्वे अॉफ इंडिया(जीएसआइ) के वैज्ञानिक जनार्दन ने कहा कि यह जियोलॉजिकल हेरीटेज है, जिसके संरक्षित करने की जरूरत है. दुनियाभर के भू-वैज्ञानिक यहां धरती की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं. सरकार यदि प्रयास करे तो बेहतर होगा.
सोसाइटी ने भी मदद का प्रस्ताव दिया:
सोसाइटी अॉफ जियो साइंटिस्ट के महासचिव डॉ अनल सिन्हा ने इस बाबत बताया कि दूधिनाला जैसे भूगर्भीय संपदा को बचाने के लिए सोसाइटी सरकार को हर संभव मदद देने के लिए तैयार है. सोसाइटी के कुछ सदस्य उस क्षेत्र का दौरा भी कर चुके हैं.