रांची : किसानों को भा रही है जीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की खेती : डॉ कौशल

रांची : बीएयू कुलपति डॉ परविंदर कौशल ने कहा कि जीरो टिलेज तकनीक को अपना कर राज्य के किसान विपरीत हालात में भी कम समय और लागत से गेहूं का उत्पादन कर सकते हैं. इसे अपनाने से खरीफ मौसम में हुई फसल क्षति की भरपाई भी की जा सकती है.किसानों के लिए उपयोगी ऐसी तकनीकों […]

रांची : बीएयू कुलपति डॉ परविंदर कौशल ने कहा कि जीरो टिलेज तकनीक को अपना कर राज्य के किसान विपरीत हालात में भी कम समय और लागत से गेहूं का उत्पादन कर सकते हैं. इसे अपनाने से खरीफ मौसम में हुई फसल क्षति की भरपाई भी की जा सकती है.किसानों के लिए उपयोगी ऐसी तकनीकों के प्रसार में बीएयू प्रयत्नशील है.
डॉ कौशल ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर), नयी दिल्ली द्वारा प्रायोजित फार्मर फर्स्ट प्रोग्राम के तहत किसानों की समस्या का समाधान व आय वृद्धि के प्रयास किये जा रहे हैं.
इसके लिए वर्ष 2017 से रबी मौसम में संरक्षण कृषि के तहत धान अाधारित फसल प्रणाली में गेहूं की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. योजना समन्वयक डॉ निभा बाड़ा ने कहा कि इस वर्ष अनियमित एवं कम वर्षापात के कारण खेतों में काफी नमी से किसान चिंतित हैं और रबी फसलों की बोआई में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. जिसे देख इन गांवों के किसान जीरो टिलेज तकनीक से खेती की ओर प्रेरित हुए हैं.
इस तकनीक से खेतों की जुताई के बगैर ही गेहूं की बोआई की जाती है और धान फसल की कटाई के तुरंत बाद उसी खेत में बिना जोते जीरो सीड ड्रिल मशीन से गेहूं की बोआई की जाती है. बीएयू के वैज्ञानिक डॉ सीएस सिंह बताते हैं कि राज्य में नवंबर का माह गेहूं की खेती के लिए काफी उपयुक्त है. 25 नवंबर के बाद गेहूं की बोआई से प्रतिदिन 25-30 किलो प्रति हेक्टेयर उपज में कमी पायी जाती है. मौके पर डॉ सीएस सिंह, आलोका बागे, आरएन ठाकुर व प्रवीण तरून एक्का की भूमिका महत्वपूर्ण रही.

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