रांची. पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा इस राज्य की उन हस्तियों में से एक हैं, जिन्होंने झारखंड की संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलायी. शिक्षाविद, झारखंड आंदोलनकारी, संस्कृतिकर्मी, लेखक और विचारक, हर भूमिका में सर्वश्रेष्ठ. झारखंड आंदोलन को बौद्धिक दिशा देने में उनकी अहम भूमिका रही. आदिवासियों से जुड़े मुद्दों पर उनका मौलिक चिंतन था. उन्होंने झारखंड की संस्कृति, आंदोलन व अन्य विषयों पर कई पुस्तकें लिखीं. उनका पूरा जीवन लोगों के लिए मिसाल है. आज उनकी जयंती पर उनसे मिली सीख बता रहे हैं डीएसपीएमयू के सहायक प्राध्यापक डॉ अभय सागर मिंज
न किसी की निंदा करते थे न सुनते थे
डॉ रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व के कई आयामों ने मुझे गहरे रूप से प्रभावित किया और मैंने उन्हें अपने जीवन में आत्मसात भी किया. इनमें एक था परनिंदा से दूर रहना. उनकी वाणी से कभी किसी की निंदा नहीं निकली. यदि कोई उनके सामने किसी की बुराई शुरू भी करता, तो वे अत्यंत शालीनता से बात का रुख मोड़ देते थे.
अनुशासन और समय के पक्के
अनुशासन और समय की पाबंदी को लेकर वे बेहद सख्त थे. एक बार एक पत्रकार उनसे मिलने में मात्र छह मिनट लेट हो गये, तो उन्होंने मिलने से मना करते हुए उन्हें अगले दिन आने को कह दिया था. अपने निजी जीवन में भी उन्होंने अनुशासन और समय की पाबंदी को बनाये रखा.
समावेशी दृष्टि व सामाजिक एकता
उनका दृढ़ विश्वास था कि एक संगठित समाज ही प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता है. वे सबको साथ लेकर चलनेवाले व्यक्तित्व थे. उनके गीतों में आदिवासी, मूलवासी और सदान, हर समुदाय के प्रति समान आदर और स्नेह झलकता था.
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हमेशा सकारात्मक रहने की सीख
अपने अंतिम दिनों में उन्होंने एक गहरा जीवन-मंत्र दिया था. नकारात्मक बातों पर कभी अपनी ऊर्जा और समय व्यर्थ न करें. जीवन में चिंता केवल उन्हीं पहलुओं की करें, जिन्हें आप अपने स्तर पर सुधार सकते हैं, उनकी कभी नहीं जो आपके नियंत्रण से बाहर है.
