संत तुलसीदास व मुंशी प्रेमचंद के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकता

संत तुलसीदास एवं मुंशी प्रेमचंद के जन्म दिवस के अवसर पर सुखदेव सहाय मधेश्वरा सहाय डिग्री महाविद्यालय के सभा कक्ष में एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया

संत तुलसीदास एवं मुंशी प्रेमचंद के जन्म दिवस के अवसर पर विचार गोष्ठी

फोटो 31 डालपीएच- 11

प्रतिनिध, तरहसी

संत तुलसीदास एवं मुंशी प्रेमचंद के जन्म दिवस के अवसर पर सुखदेव सहाय मधेश्वरा सहाय डिग्री महाविद्यालय के सभा कक्ष में एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता प्रोफेसर इंचार्ज प्रभाकर ओझा ने की. मंच का संचालन विनीतचंद्र पांडेय ने किया. गोष्ठी के अतिथि डॉ अरुण तिवारी ने कहा कि तुलसीदास नहीं होते, तो रामचरितमानस भी नहीं होता. तुलसीदास श्रृंगार रस के विशिष्ट एवं मर्यादित कवि हैं. वह उपदेश के मूल रूप में भी सामने आते हैं. रामचरितमानस में सर्वत्र समन्वय एवं विराट चेष्टा की गयी है. शिव और वैष्णो का समन्वय निर्गुण और शगुन का समन्वय ज्ञान और भक्ति का समन्वय राजा और प्रजा का समन्वय सब कुछ तुलसीदास ने रामचरितमानस में समाहित किया है. तुलसीदास की भक्ति भावना निर्गुण भक्तों की रहस्यमयी भक्ति नहीं है अपितु व सरल एवं सहज है. उनके राम कण-कण में व्याप्त है और सर्वजन सुलभ हैं. उत्तरकांड में तुलसी ने ज्ञान भक्ति का जो विवेचन किया है वह उन्हें उच्च कोटि का विद्वान सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है. तुलसीदास ने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य शैलियों में रचनाएं प्रस्तुत की हैं. उन्होंने ब्रजभाषा और अवधि दोनों काव्य भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त था.जबकि प्रेमचंद के विषय में कहा कि अपने समय के उपन्यासकार कहानीकार , साहित्यकार के रूप में प्रेमचंद का स्थान उच्च कोटि का है. उन्होंने साहित्य और भाषा के क्षेत्र में जो काम किया वह मुंशी प्रेमचंद ही कर सकते थे. इस अवसर पर, कई बच्चों ने भी अपने विचार व्यक्त किये .मौके पर प्रो तनवीर खान,लेखासहायक, रामप्रवेश पांडेय सहित बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं मौजूद थे.

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By VIKASH NATH

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