संतोष कुमार, बेतला
पलामू : बेतला नेशनल पार्क क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक वर्षों पुरानी पलामू किला की सैर, जो अब तक पर्यटकों के लिए पूरी तरह निशुल्क और सुलभ थी, अब बेहद महंगी होने वाली है. वन विभाग द्वारा पलामू किला अब दोपहिया और तीनपहिया वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है. नये फैसले के तहत अब केवल चार पहिया वाहनों को ही किला तक जाने की अनुमति दी जा रही है, जिसके लिए पर्यटकों को शुल्क चुकाना होगा और साथ में गाइड भी रखना अनिवार्य कर दिया गया है. वन विभाग के फैसले से मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अब इस ऐतिहासिक स्थल तक पहुंचना बेहद कठिन और खर्चीला हो गया है, जिससे स्थानीय लोगों और सैलानियों में भारी नाराजगी देखी जा रही है. हालांकि अभी गाइड के बगैर भी जाने की छूट है लेकिन विभागीय अधिकारियों के अनुसार जंगल और जानवरों की सुरक्षा को देखते हुए गाइड को साथ रखना अनिवार्य होगा और उसके लिए भी पर्यटकों को शुल्क देना होगा. इसके लिए बहुत जल्द ही प्रस्ताव लाया जायेगा.
रील्स विवाद और शराबखोरी के बाद बदली व्यवस्था
हाल ही में कुछ असामाजिक तत्वों ने पार्क के कोर एरिया में जंगली जानवरों को दौड़ाते हुए रील्स बनाई थी. इसके साथ ही जंगल में शराब पीते हुए भी रील्स बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल की गयी थी. रील्स वायरल होने और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी द्वारा इस मामले पर कड़ा संज्ञान लिए जाने के बाद ही वन विभाग के पदाधिकारियों ने यह कदम उठाया है. इसी विवाद के बाद विभाग ने वर्षों पुरानी निशुल्क व्यवस्था को खत्म कर इसे पहली बार शुल्क आधारित और गाइड की अनिवार्यता के साथ लागू किया गया है. सैलानी अपने दोपहिया और तीनपहिया वाहनों से किला देखने जाते रहे हैं, लेकिन अब चेक नाका पर इन्हें पूरी तरह रोक दिया जा रहा है.
50 रुपये या 1200 रुपये शुल्क
चार पहिया वाहन से पहुंचने वाले पर्यटकों को वन विभाग के चेक नाका पर 50 रुपये का टोकन शुल्क देना पड़ रहा है. वहीं जिन पर्यटकों के पास अपना चार पहिया वाहन नहीं है, उन्हें पलामू किला जाने के लिए निजी टाइगर सफारी वाहन का सहारा लेना पड़ रहा है, जिसके लिए 1200 रुपये तक का भारी-भरकम शुल्क चुकाना पड़ रहा है.
पुनर्विचार और नये सिरे से समीक्षा की मांग
चेक नाका पर तैनात वनकर्मियों का कहना है कि यह व्यवस्था उच्च अधिकारियों के निर्देश पर ही लागू की गयी है. हालांकि, स्थानीय नागरिकों और पर्यटन से जुड़े लोगों का मानना है कि वन विभाग को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए. उनका कहना है कि किसी भी व्यवस्था में बदलाव करने से पहले स्थानीय लोगों और पर्यटन उद्योग से जुड़े हितधारकों से राय ली जानी चाहिए थी. क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने वन विभाग के वरीय अधिकारियों से मांग की है कि इस पूरे मामले की नये सिरे से समीक्षा की जाये. उन्होंने अपील की है कि विभाग को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे पर्यावरण और वन्यजीवों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके और आम पर्यटकों को भी इस ऐतिहासिक धरोहर तक आसानी से पहुंच मिलती रहे.
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