लोहरदगा़ लोहरदगा में रामनवमी का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है, लेकिन सामूहिकता के साथ अखाड़ा पूजन और शोभायात्रा की नींव 1945 के आसपास पड़ी. बुजुर्ग बताते हैं कि रांची की तर्ज पर 1944-45 में स्थानीय युवाओं नरसिंह साहू, वनमाली प्रसाद, बृज माली प्रसाद, खेमराज पोद्दार, बुद्धन सिंह, रामटहल ठाकुर, राघव दास , मनोरी लाल बर्म्मन, जगेश्वर प्रसाद खत्री, रामाकांत प्रसाद आदि ने डंका और अस्त्र-शस्त्र पूजा की शुरुआत की. स्वतंत्रता सेनानी बुद्धन सिंह पहले लाइसेंसधारी बने. शुरुआती दौर में शोभायात्रा शास्त्री चौक और टंगरा टोली तक सीमित थी, जो बाद में मैना बगीचा तक विस्तारित हुई. चांदी की प्रतिमा और बांस के फाटक की परंपरा : उत्सव की सबसे खास बात 1948 में निर्मित बजरंगबली की चांदी की नक्काशीदार प्रतिमा है, जिसे गौरी शंकर बर्मन और मनोरी लाल बर्मन ने अपने हाथों से बनाया था. आज भी यह प्रतिमा जुलूस के आगे चलती है. वहीं, रामटहल ठाकुर और राघव दास द्वारा बांस व कागज से निर्मित आकर्षक ””””फाटक”””” (हनुमान जी की विशाल आकृति) को चार लोग कंधे पर लेकर चलते थे, जो अब भी परंपरा का हिस्सा है. अनुशासन और भाईचारे की मिसाल : 60 के दशक में नंदलाल प्रसाद साहू ने अस्त्र-शस्त्र चालन प्रतियोगिता की नींव रखी, जिसे अब कला समिति आगे बढ़ा रही है. पहले बिजली के तार नहीं होने से झंडे काफी विशाल और भारी होते थे. 70 के दशक में रांची से ””””उस्ताद”””” लाठी-फरसा और मार्शल आर्ट सिखाने आते थे. सामाजिक कार्यकर्ता ओमप्रकाश सिंह व संजय बर्मन बताते हैं कि अनुशासन और मर्यादा इस उत्सव की पहचान रही है. इस ऐतिहासिक यात्रा में मुस्लिम संगठनों द्वारा पेयजल व शरबत की व्यवस्था लोहरदगा की गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारे को जीवंत करती है. आज यह शोभायात्रा अपनी भव्य झांकियों और ””””भरत मिलाप”””” के लिए अंतरराज्यीय स्तर पर प्रसिद्ध है.
1945 से शुरू हुआ था अखाड़ा पूजन और शोभायात्रा का सफर
1945 से शुरू हुआ था अखाड़ा पूजन और शोभायात्रा का सफर
