कुड़ू लोहरदगा. दो जून 1968 को हुआ चीरी गोलीकांड आदिवासी समाज के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है. उस समय भोला नामक व्यक्ति ने महाजनी प्रथा के जरिये भोले-भाले आदिवासियों की जमीन पर कब्जा जमा लिया था. वह उन्हें शराब पिलाकर और ऊंचे ब्याज पर पैसा देकर उनकी जमीन हड़प रहा था. एक साल के भीतर उसने चीरी और आसपास के लगभग बीस ग्रामीणों की जमीन पर कब्जा कर लिया. इससे आदिवासी समाज में गहरा आक्रोश फैल गया और उन्होंने आंदोलन की रूपरेखा तय की. दो जून 1968 को चीरी और आसपास के आधा दर्जन गांवों के ग्रामीण पारंपरिक हथियारों के साथ भोला के मकान पर धावा बोल दिये. मकान को ध्वस्त कर दिया गया और कब्जायी गयी जमीन पर अपना झंडा गाड़ दिया. भोला ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची. पहले बहसबाजी हुई, फिर हाथापाई और मारपीट शुरू हो गयी. स्थिति बिगड़ते देख पुलिस ने गोलीबारी कर दी. इस गोलीकांड में छह आंदोलनकारी शहीद हुए—सामुएल तिर्की, खुईता उरांव, जोहन कुजूर, खदिया उरांव, एतवा उरांव और जुरा उरांव. इसके अलावा दो दर्जन से अधिक ग्रामीण घायल हुए. बावजूद इसके, आंदोलनकारियों ने भोला का मकान जला दिया और उसके परिवार को गांव से भगा दिया. इस घटना ने आदिवासी समाज के अधिकारों और जमीन की रक्षा के संघर्ष को नई दिशा दी. तभी से हर साल दो जून को चीरी चौक में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है. शहीदों के परिजन स्मारक स्थल पर पूजा-अर्चना करते हैं और समाज के लोग उन्हें नमन करते हैं. समारोह में कई अतिथि शामिल होते हैं और शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किया जाता है. आज भी यह आयोजन आदिवासी समाज की एकता और उनके संघर्ष की याद दिलाता है. चीरी गोलीकांड केवल एक घटना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आदिवासी समाज की आवाज और उनके बलिदान का अमर प्रतीक है.
चीरी गोलीकांड आदिवासी समाज के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक
चीरी गोलीकांड आदिवासी समाज के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक
