प्रभार के भरोसे लोहरदगा का प्रशासनिक ढांचा, अधिकारियों की भारी कमी से विकास कार्यों पर ब्रेक

प्रभार के भरोसे लोहरदगा का प्रशासनिक ढांचा, अधिकारियों की भारी कमी से विकास कार्यों पर ब्रेक

लोहरदगा़ जिले में सरकारी तंत्र और विकास योजनाओं की रफ्तार अधिकारियों के रिक्त पदों के कारण सुस्त पड़ गयी है. महत्वपूर्ण विभागों में स्थायी पदाधिकारियों की कमी के कारण अधिकांश कामकाज प्रभार के भरोसे रेंग रहा है. जिले में डीडीसी, रजिस्ट्रार, कार्यपालक पदाधिकारी जिला परिषद, समाज कल्याण पदाधिकारी, निदेशक डीआरडीए, जिला योजना पदाधिकारी, भू अर्जन पदाधिकारी, कोषागार पदाधिकारी, उप निर्वाचन पदाधिकारी, खनन पदाधिकारी, अनुमंडल शिक्षा पदाधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पद रिक्त पड़े है़ं एक अधिकारी पर कई विभागों का बोझ, धरातल पर योजनाएं ठप : प्रशासनिक रिक्तियों का आलम यह है कि कार्यपालक दंडाधिकारी के स्वीकृत छह पदों में से केवल एक पद पर ही तैनाती है, जबकि अनुमंडल कार्यालय में स्वीकृत तीनों पद खाली पड़े हैं. कागजों पर विकास के बड़े-बड़े दावे तो किये जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में योजनाओं की मॉनिटरिंग और जनसमस्याओं का समाधान प्रभावित हो रहा है. आम लोगों को जाति, आवासीय प्रमाण पत्र से लेकर विभिन्न योजनाओं की स्वीकृति के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. सांसद सुखदेव भगत ने जतायी चिंता : जिले में अधिकारियों की कमी पर सांसद सुखदेव भगत ने गहरी चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि रिक्त पदों के कारण विकास योजनाओं का धरातल पर न उतरना चिंतनीय है. वे इस गंभीर विषय को लेकर जल्द ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात करेंगे और जिले में स्थायी अधिकारियों की अविलंब पदस्थापना का अनुरोध करेंगे. अभिनीत सूरज के जिम्मे विभागों की पहाड़ जैसी सूची : लोहरदगा में पदस्थापित एकमात्र कार्यपालक दंडाधिकारी अभिनीत सूरज के कंधों पर कई विभागों का भार है. वे वर्तमान में स्थापना, नजारत, विकास शाखा, सामान्य शाखा, डीएमएफटी, सहायक जिला योजना, विधि और गोपनीय शाखा के प्रभारी के रूप में कार्य कर रहे हैं. जानकार मानते हैं कि स्थापना और नजारत जैसी महत्वपूर्ण शाखाओं का प्रभार एक ही अधिकारी के पास होने से कामकाज की शुचिता पर भी असर पड़ता है. जनता और संसाधन दोनों पस्त : स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का कहना है कि प्रभार व्यवस्था जिले के विकास के लिए स्थायी समाधान नहीं है. सड़क, पेयजल और सिंचाई जैसी बुनियादी योजनाओं की समीक्षा समय पर नहीं हो पा रही है. आम लोगों को प्रमाण पत्र, योजनाओं की स्वीकृति, जांच रिपोर्ट और अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए बार-बार कार्यालयों का चक्कर लगाना पड़ रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में चल रही सड़क, पेयजल, आवास और सिंचाई योजनाओं की निगरानी भी प्रभावित हो रही है. कई अधिकारी विभाग का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं, जिसके कारण समय पर निरीक्षण और समीक्षा नहीं हो पा रही है. कर्मचारियों का कहना है कि सीमित संसाधनों और कम मानवबल के बीच काम करना चुनौती बन गया है.

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Published by: Shailesh ambashtha

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