गोपी/विनोद
लोहरदगा : लोहरदगा जिला की स्थापना के समय लोगों ने बहुत सारी कल्पनायें की थी. सपने देखे थे और सोचा था किजिला बनने के बाद लोहरदगा तमाम समस्याओं से मुक्त होगा और यहां तमाम वे सुविधाएं उपलब्ध होंगी जो एक जिला में होनी चाहिए.
17 मई 1983 को लोहरदगा जिला की स्थापना की गयी. विकास के नाम पर कई काम हुए इनमें रांची-लोहरदगा बड़ी रेलवे लाइन और रेलवे का विद्युतिकरण शामिल है. बड़ी लाइन के बाद लोहरदगा जिला में आवागमन की सुविधा बढ़ी. जिला बनने के बाद लोग गांव छोड़ कर शहर में आकर बसने लगे और आज स्थिति यह है कि गांव में सिर्फ बच्चे और बुढ़े बच गये हैं. गांवों से जवानी गायब हो गयी है.
शहर में विकास की किरण नजर आती है लेकिन रांची से नजदीक होने के कारण यहां का व्यापार मंदा पड़ गया है. उद्योग विहीन इस जिले में बेरोजगारों की लंबी फौज है. प्रतिभाएं कुंठीत हो रही है. जिला बनने के बाद विकास के नाम पर वायदे तो बहुत हुए लेकिन धरातल पर बहुत कुछ नहीं हो पाया. पर्यटन के नाम पर लोहरदगा जिला वासियों को आश्वासनों की घूंट बराबर पिलायी गयी. कहा गया कि लोहरदगा जिला में अनेक ऐसे स्थल हैं जो पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किये जा सकते हैं. चाहे वो खखपरता का प्राचीण शिव मंदिर हो या फिर पेशरार इलाके का लावापानी जलप्रपात. आज तक जिले के किसी भी स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं किया जा सका है.
मंत्री से लेकर अधिकारी तक घोषणाएं और दावे करते रहें. लेकिन सरकार ने लोहरदगा जिला के एक भी स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं किया. ये स्थल आज भी उपेक्षित हैं. जबकि जिले में मनोरम स्थलों की भरमार है. थोड़ी सी राशि खर्च कर लोहरदगा जिला के कई स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है. लेकिन इसमें किसी की रूचि नहीं है.
इसी तरह जिले में व्याप्त समस्याओं के निदान को लेकर भी कोई खास प्रयास नहीं हो रहा है. भाषणों में लगातार कहा जाता है कि लोहरदगा जिला कृषि प्रधान जिला है और यहां के किसान बहुत मेहनती हैं. लेकिन किसानों की क्या दशा है इस पर किसी का ध्यान नहीं है. लोहरदगा जिला में ना तो कोई फूड प्रोसेसिंग प्लांट है और ना ही कोई कोल्ड स्टोरेज है. जहां किसान अपने उत्पादों को रख सकें. खेतों में लगी सब्जियां बाजार में भाव नहीं मिलने के कारण खेत में ही छोड़ दिये जा रहे हैं.
किसान कर्ज के बोझ से लगातार दबते जा रहे हैं. यदि यहां कोई फूड प्रोसेसिंग प्लांट होता तो खेतों में लगी सब्जियों का उपयोग होता. यदि कोल्ड स्टोरेज होता तो सड़कों पर सब्जियां नहीं फेंकी जाती. लेकिन लोहरदगा को कृषि प्रधान जिला बता कर और किसानों को मेहनती बता कर अधिकारी और जनप्रतिनिधि अपना पल्ला झाड़ लेते हैं.
जिला बनने के बाद से लोहरदगा में अब तक एक बस पड़ाव का निर्माण तक नहीं हो सका है. रेलवे की जमीन पर कब्जा कर बस पड़ाव का रूप दिया गया है. हां यहां से प्रतिवर्ष 35 से 40 लाख रुपये का राजस्व नगर परिषद लेती है. लेकिन सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है
लोहरदगा शहर में हमेशा सड़का जाम होते रहती है. सड़क जाम के कारण लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. दुर्घटनाएं होती है. लोग असमय काल के गाल में समाते हैं. लेकिन जिले में अब तक एक बाइपास सड़क का निर्माण भी नहीं हो पाया है. कागजी कार्रवाई की जा रही है और सरकारी प्रक्रिया की स्थिति क्या है ये बात किसी से छुपी नहीं है. शहर में गंभीर पेयजल संकट व्याप्त है. अभी तक पेयजल की मुक्कमल व्यवस्था नहीं हो पायी है. लोगों को अहले सुबह उठ कर पानी के जुगाड़ में निकलना पड़ता है. जलापूर्ति योजना भ्रष्टाचार के आगोश में समा चुकी है.
लोग फरियाद करें तो कहां करें. जिस जिले में पेयजल की मुक्कमल व्यवस्था ना हो वहां की स्थिति का आकलन सहज ही किया जा सकता है. जिले में अभी भी बुनियादी सुविधाओं का आभाव है. यदि दृढ़ इच्छा शक्ति और ईमानदारी प्रयास किया जाये तो सात प्रखंडों वाला लोहरदगा जिला एक मॉडल जिला बन कर पूरे राज्य में एक मिसाल कायम करसकता है.
