कुड़ू : प्रखंड मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर बड़की चांपी पंचायत के अंतर्गत एक गांव है मसुरियाखांड़ : गांव की आबादी 225 है. आज देश के सभी राज्य तेजी के साथ विकास के पथ पर अग्रसर है़ं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण मसुरियाखांड़ गांव के लोग आजादी के 70 साल बाद भी चुआं का दूषित पानी पीने को विवश हैं. नदी में चुआं बना कर गांव के लोग अपनी प्यास बुझाते हैं. तपती गरमी हो या फिर सर्दी या बरसात 12 महीने यहां के लोग चुआं का ही पानी पीते हैं. बताया जाता है कि दो पहाड़ों तथा जंगलों के बीच बसे गांव में जाने के लिए दो रास्ते हैं. बंदुवा होकर रेलवे ट्रैक पार करने के बाद जंगली पगडंडी से पैदल या साइकिल से ग्रामीण गांव जाते हैं. दूसरा रास्ता चंदवा प्रखंड के जिलिंग गांव होकर जाता है. दोनो काम चलाऊ सड़क है. गाड़ी आने-जाने का कोई साधन नहीं है. गांव में पीएचइडी विभाग द्वारा पेयजल के लिए कुआं में चापानल लगाया गया था.
जो कई वर्षो से बेकार पड़ा है. चुआं के अलावा पीने के पानी का कोई साधन नहीं है. गांव की कबुतरी देवी, बिगन गंझू, जगेश्वर गंझू, नागेश्वर गंझू, शिवनाथ गंझू आदि ने बताया कि गांव में पीने के पानी का एकमात्र साधन नदी में बना चुआं है. कई बार पीने के पानी के लिए कुड़ू प्रखंड प्रशासन से लेकर जिला प्रशासन तथा सलगी में आयोजित मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में चापानल लगाने के लिए आवेदन दिया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. ग्रामीण बताते हैं कि गरमी में गांव में एक चापानल लगाने की स्वीकृति मिली थी. विभाग के कहने पर चंदवा प्रखंड के सिसकरिया से गांव तक सड़क का निर्माण चापानल गाड़ी ले जाने के लिए कराया गया था. श्रमदान करते हुए नदी में पत्थर भरते हुए सड़क बनाया गया.
लेकिन मसुरियाखांड़ में लगनेवाला चापानल कहां गया पता नहीं. इस संबध में कुड़ू पीएचइडी के कनीय अभियंता रोहित भगत ने बताया कि मसुरियाखांड़ में चापानल लगाना था लेकिन गाड़ी जाने के लिए सड़क नहीं होने के कारण चापानल नहीं लगा. अगले साल चापानल लगाया जायेगा़ कुड़ू बीडीओ संतोष कुमार ने बताया कि गांव में पानी की समस्या का मामला अभी संज्ञान में आया है. मसुरियाखांड़ मे पेयजल की सुविधा बहाल करायी जायेगी. गाड़ी जाने की सड़क नहीं है तो हैंडबोरिंग कराया जायेगा. पीने के पानी की समस्या को दूर करने का प्रयास किया जायेगा.
