बेतला. व्यास बिगू सिंह भारतीय लोक संस्कृति और आध्यात्मिकता के संगम की जीवंत मिसाल हैं. लातेहार जिले के बरवाडीह प्रखंड के कुटमू गांव निवासी 70 वर्षीय सिंह पेशे से किसान रहे, लेकिन अपनी मखमली और सुरीली आवाज से उन्होंने लोक गायकी को नई ऊंचाई दी. बचपन से ही गायन की शुरुआत कर उन्होंने 1980 से अखंड कीर्तन के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई. पारंपरिक धुनों में आधुनिक पुट डालकर उन्होंने कीर्तन को नया स्वरूप दिया और युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया. उनकी गायकी में वह कशिश है जो श्रोताओं को घंटों तक मंत्रमुग्ध कर देती है. जब वे कीर्तन की शुरुआत करते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है. उस दौर में अखंड कीर्तन गांवों में सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था. बिगू सिंह मानते हैं कि लोक गायकी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी मिट्टी की खुशबू और संस्कृति की रक्षा का माध्यम है.
आज वे बिगड़ते गीत-संगीत से चिंतित होकर मंच से दूरी बना चुके हैं. इसके बजाय वे अपने रचित गीतों को लिखित रूप में संरक्षित करने में जुटे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी परंपरा और संस्कृति से जुड़ी रहें. उनका प्रयास यह संदेश देता है कि लोक विधाओं को बचाना हमारी जिम्मेदारी है. बिगू सिंह की जीवन यात्रा हमें यह सिखाती है कि परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाकर ही संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है.
