लाह की खेती के लिए गिनीज बुक में दर्ज हो चुका है लातेहार का नाम, सांसद ने लोकसभा में कहा, खेती का दर्जा मिले

एक वक्त था जब लातेहार लाह की खेती के लिए दुनियाभर में मशहूर था. लाह की रिकार्ड उत्पादन के लिए वर्ष 1976 में लातेहार का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड बुक में दर्ज किया गया था.

लातेहार : एक वक्त था जब लातेहार लाह की खेती के लिए दुनियाभर में मशहूर था. लाह की रिकार्ड उत्पादन के लिए वर्ष 1976 में लातेहार का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड बुक में दर्ज किया गया था. लाह की खेती में देश दुनिया के व्यापारी बड़ी पूंजी निवेश करते थे.

लातेहार जिला में लाह की तकरीबन डेढ़ से दो सौ गद्दियां थी जिसमें पश्चिम बंगाल, मुंबई, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के व्यापारी बैठते थे. लातेहार से लाह का क्रय कर महाराष्ट्र, गुजराज व पश्चिम बंगाल के बलरामपुर व पुरूलिया ले जाया जाता था और यहां से लाह की चउरी व चपड़ा (लाह को फिल्टर कर बनाया जाता है) बना कर इसकी देश व विदेश में सप्लाई की जाती थी.

वर्ष 1997 में विश्व के आठ प्रमुख लाह उत्पादक देशों में लातेहार से निर्यात हुए लाह की क्वालिटी सबसे अच्छी साबित हुई थी और यहां के लाह उत्पादकों एवं व्यापारियों को वर्ल्ड ट्रैड सेंटर कोलकाता में पुरस्कृत किया गया था. वर्ष 2005 तक लाह के उत्पादन में लातेहार जिला का दबादबा था. लेकिन बाद में धीरे धीरे जिले में लाह की खेती कम होती चली गयी. आज जिले में 20 प्रतिशत भी लाह की खेती नहीं होती है.

क्या है कारण

बताया जाता है कि सरकार व प्रशासन के द्वारा लाह की खेती करने वाले किसानों को गुणवत्तायुक्त बिहन (कीड़े) उपलब्ध नहीं कराने एवं जंगलों से पलास व अन्य पेड़ों की कटाई लगातार किये जाने के कारण जिले से लाह की खेती को नुकसान हुआ है. इसके अलावा जिले में मधुमक्खी पालन करने वालो से भी लाह की फसल को खासा नुकसान हुआ है. मधुमक्खियां लाह के कीड़ों को खा जाते थे, इसका असर लाह की पैदावार पर हुआ. यही कारण था कि पहले ग्रामीण क्षेत्रों मे लोग मधुमक्खी पालकों को शरण नहीं देते थे. लाह के कीड़ों को पलास, खैर, पीपल, बेर व कुसम आदि पेड़ों की टहनियों पर टांग दिया जाता है. जब कीड़े पेड़ की टहनियों में पूरी तरह फैल कर सख्त हो जाते थे तो उन्हें तोड़ कर बाजारों में बेचा जाता था. लाह को एक नगदी फसल के रूप में जाना जाता है.

लाह का प्रयोग

लाह का प्रयोग ग्रामोफोन रिकार्ड, हवाई जहाज एवं विद्युत यंत्र बनाने, वार्निश और पॉलिश बनाने, विशेष प्रकार की सीमेंट और स्याही के बनाने, ठप्पा देने की स्टीक बनाने, चूड़ियों और पालिशों के निर्माण, काठ के खिलौनों के रंगने और सोने व चांदी के आभूषणों में रिक्त स्थानों को भरने में होता है. यह गरम होने पर पिघलता है और ठंड होने पर ठोस हो जाता है.

सांसद ने लाह की खेती को कृषि की श्रेणी में रखने की की मांग

सांसद सुनील सिंह ने गत 12 मार्च को लोकसभा में पलास की पेड़ पर लाह की खेती को वन उत्पाद की श्रेणी से हटा कर कृषि की श्रेणी में रखने एवं इसके संरक्षण व संवर्द्धन करने का अधिकार ग्रामीणों को देने की मांग की. उन्होने कहा कि झारखंड लाह पोषक वृक्षों का सरंक्षण, संवर्द्धन व प्रबंधन की व्यवस्था ग्रामीणों को देने की दरकार है. लाह के माध्यम से ग्रामीण बेरोजगार युवक रोजगार पा सकते हैं और ग्रामों में लघु एवं कुटीर उद्योग की स्थापना की जा सकती है. इसमे महिलाओ की 90 प्रतिशत सहभागिता होती है. श्री सिंह ने कहा है कि झारखंड के 12 लाह फार्म हैं लेकिन विभागीय निष्क्रियता के कारण करोड़ों रूपये का आर्थिक नुकसान हो रहा है.

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Author: PankajKumar Pathak

Published by: Prabhat Khabar

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