आदिवासी परंपराओं से हो रहा जंगल और वन्यजीवों का संरक्षण

आदिवासी परंपराओं से हो रहा जंगल और वन्यजीवों का संरक्षण

बेतला़ जिस दौर में जंगल और जानवरों की सुरक्षा को लेकर कोई कानून नहीं बना था, उस समय भी लोग अपने पारंपरिक अनुष्ठानों और मान्यताओं के जरिये जंगल तथा वन्यजीवों की रक्षा करते रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इन परंपराओं में कई आदिवासी समुदायों की प्रथाएं और रीति-रिवाज शामिल हैं, जो प्रकृति को देवी-देवता मानते हुए उसके संरक्षण पर केंद्रित हैं. यही कारण है कि पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) की स्थापना से पहले भी लोग जंगल और जानवरों की सुरक्षा में लगे रहे. इसका परिणाम आज 1129 वर्ग किलोमीटर में फैले हरे-भरे जंगल के रूप में सामने है. वन्य प्राणी सप्ताह के अवसर पर इन परंपराओं को आम लोगों तक पहुंचाने की पहल की गयी है. पलामू टाइगर रिजर्व के गारू वन प्रक्षेत्र में आयोजित विशेष अनुष्ठान में ग्रामीण, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं. केशरा चंडी देवी की पूजा से होती है जंगल की रक्षा : पीटीआर के घने जंगलों में रहने वाले लोग पीढ़ियों से जंगल और जानवरों की सुरक्षा के लिए केशरा चंडी देवी की पूजा करते रहे हैं. इस वर्ष वन्य प्राणी सप्ताह के दौरान भी केशरा चंडी देवी की स्थापना कर बैगा समुदाय के लोग पारंपरिक पूजा-अर्चना कर रहे हैं. उनका विश्वास है कि देवी की कृपा से जंगल और वन्यजीव सुरक्षित रहते हैं. इसके साथ ही जंगल की देवी, वनदेवी की भी पूजा की जा रही है. हर गांव में होता है ‘पवित्र उपवन’ का संरक्षण : आदिवासी परंपरा में हर गांव के बाहर एक पवित्र उपवन होता है, जिसे किसी भी मानव हस्तक्षेप से अछूता रखा जाता है. इसे वन देवी का वास माना जाता है. कई जगह इसे ‘माड़र’ कहा जाता है. यहां सरहुल पूजा और अन्य अनुष्ठान कर लोग गांव और जंगली जानवरों की सुरक्षा की कामना वनदेवी से करते हैं. परंपराएं बनेंगी संरक्षण की प्रेरणा : रेंजर उमेश कुमार दुबे : रेंजर उमेश कुमार दुबे ने कहा कि जंगल क्षेत्र में रहने वाले लोगों की पारंपरिक मान्यताओं और अनुष्ठानों को सार्वजनिक करने की कोशिश की जा रही है. इससे जंगल और वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय लोगों का सहयोग बढ़ेगा और वन विभाग को भी मदद मिलेगी.

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By Shailesh ambashtha

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