तत्कालीन चारों कोषागार पदाधिकारी संलिप्त

18कोडपी1कोषागार कार्यालय.18कोडपी2कोषागार कार्यालय का प्रधान सहायक, जो फरार है.18कोडपी10वजगृह का डबल लॉक सिस्टम.18कोडपी11एएसपी नौशाद आलम.स्टांप घोटाले प्रभात खास एसपी के निर्देश पर एएसपी ने कीजांच, रिपोर्ट में अधिकारियों की संलिप्तता से इनकार नहींप्रधान सहायक, अनुसेवक व डीड राइटर की भूमिका सबसे ज्यादाविकासकोडरमा. स्टांप घोटाला मामले में बड़ा खुलासा हुआ है. घोटाले में शुरुआत में जहां […]

18कोडपी1कोषागार कार्यालय.18कोडपी2कोषागार कार्यालय का प्रधान सहायक, जो फरार है.18कोडपी10वजगृह का डबल लॉक सिस्टम.18कोडपी11एएसपी नौशाद आलम.स्टांप घोटाले प्रभात खास एसपी के निर्देश पर एएसपी ने कीजांच, रिपोर्ट में अधिकारियों की संलिप्तता से इनकार नहींप्रधान सहायक, अनुसेवक व डीड राइटर की भूमिका सबसे ज्यादाविकासकोडरमा. स्टांप घोटाला मामले में बड़ा खुलासा हुआ है. घोटाले में शुरुआत में जहां कोषागार कार्यालय के प्रधान सहायक अशोक कुमार सिंह, अनुसेवक मोहन कुमार व डीड राइटर प्रेम प्रकाश सिन्हा की भूमिका सामने आयी थी, वहीं अब इसमें अलग-अलग समय में कोषागार पदाधिकारी रहे अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ गये हैं. एसपी संगीता कुमारी के निर्देश के बाद एएसपी ने पूरे मामले की जांच की है. एएसपी नौशाद आलम ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें तत्कालीन चारों कोषागार पदाधिकारियों पास्कल मिंज, अरविंद कुमार, भोगेंद्र ठाकुर व संजय कुमार की संलिप्तता से इनकार नहीं किया गया है.एएसपी ने इन सभी के खिलाफ साक्ष्य जुटा कर वरीय पदाधिकारियों से निर्देश लेकर कार्रवाई करने की सिफारिश भी की है. अगस्त माह में कोडरमा कोषागार कार्यालय में स्टांप घोटाला का मामला कोषागार पदाधिकारी मनोज कुमार दुबे ने पकड़ा था. इसके बाद डीसी के रवि कुमार ने जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की थी. डीडीसी अभय कुमार सिन्हा, अपर समहर्ता अरविंद कुमार मिश्र व कोषागार पदाधिकारी मनोज कुमार दुबे वाली टीम ने कई दिनों तक चले जांच के दौरान 24 मामला घोटाला के पकड़ा था. कोषागार कार्यालय में बैंक चालान में हेराफेरी कर करीब 31 लाख रुपये का घोटाला किये जाने की बात सामने आई थी. इसमें प्रधान सहायक, अनुसेवक पर आरोप लगाया गया था, जबकि सभी मामले डीड राइटर पीपी सिन्हा से ही जुड़े थे.ऐसे दिया था घोटाला को अंजामकोषागार कार्यालय में प्रधान सहायक व अन्य की मिलीभगत से घोटाले को अंजाम दिया गया था. सबसे पहले डीड राइटर की ओर से स्टांप लेने के लिए बैंक में 16 हजार की राशि जमा कर चालान लाया जाता था फिर इसे कोषागार कार्यालय में जमा करने से पहले 16 से पहले 1 लगा कर इसे एक लाख 16 हजार कर दिया जाता था और फिर इसी के सहारे इतने के स्टांप की निकासी कर ली जाती थी. इस तरह का 24 मामला जांच के दौरान पकड़ा गया था. इसके बाद 11 सितंबर 2014 को कोडरमा थाना में कोषागार पदाधिकारी मनोज कुमार दुबे के आवेदन पर कांड संख्या 160/14 दर्ज किया गया था. एएसपी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि प्रधान सहायक के द्वारा बैंक प्रति में भरी सही राशि से कंप्यूटर द्वारा लेखा अंकित कर महालेखाकर को प्रतिवेदन भेज दिया जाता था. दूसरी तरफ लिप्त लेखन काउंटर फाइल से स्टांप रजिस्टर में संधारित कर दिया जाता है और स्टांप रजिस्टर में भी उसी के आधार पर सही गणना एवं प्रविष्टि कर दी जाती है, जिस पर उच्च अधिकारियों के प्रभार लेने के क्रम में सब कुछ ठीक प्रतीत होता है.एएसपी की रिपोर्टडबल लॉक सिस्टम के बावजूद हुआ घोटालाएएसपी नौशाद आलम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जालसाजी में कोषागार के प्रधान सहायक सह लेखापाल सह स्टांप क्लर्क अशोक कुमार सिंह, अनुसेवक मोहन कुमार व डीड राइटर प्रेम प्रकाश सिन्हा की स्पष्ट रूप से संलिप्तता पायी गयी है. साथ ही दिनांक 1-1-2011 से दिनांक 8-2014 की अवधि में दिनांक 1-10-2009 से दिनांक 8-9-2013 तक पास्कल मिंज (वित्त सेवा के पदाधिकारी), दिनांक 5-9-2013 से 25-9-2013 तक अरविंद कुमार (प्रशासनिक सेवा के पदाधिकारी), दिनांक 26-9-2013 से 8-3-2014 तक भोगेंद्र ठाकुर (प्रशासनिक सेवा के पदाधिकारी), दिनांक 9-3-2014 से 8-7-2014 तक संजय कुमार (वित्त सेवा के पदाधिकारी) कोषागार पदाधिकारी के रूप में कार्यरत रहे हैं कि संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि कोषागार कार्यालय से व्रजगृह की दूरी करीब 500 मीटर है. व्रजगृह से लेखपाल बैंक से प्राप्त स्क्राल के आधार पर मिलान करते हुए स्टांप रजिस्टर में स्टांप निकासी के लिए सूची सहित विवरणी बनाते हैं उसी सूची के आधार पर स्टांप क्लर्क एवं कोषागार पदाधिकारी द्वारा स्टांप निकाला जाता है. कोषागार पदाधिकारी पंजी में चढ़ाई गई विवरणी के आधार पर ये दोनों व्रजगृह के डबल लॉक सिस्टम पहुंचते हैं. डबल लॉक सिस्टम में एक कमरे में दो दरवाजा (लोहे की किवाड़) लगा होता है जिसमें एक दरवाजा के ताला का चाभी स्टांप क्लर्क के पास व दूसरे दरवाजे का चाभी कोषागार पदाधिकारी के पास होता है. दोनों गार्ड के पास के रजिस्टर में हस्ताक्षर करते हैं और दोनों अपने-अपने चाभी से ताला खोल कर निर्धारित स्टांप की निकासी के पश्चात पुन: ताला बंद कर पुन: रजिस्टर में हस्ताक्षर करते हैं. इसके बाद स्टांप सिंगल लॉक में भेज देते हैं जो लेखापाल के अधीन होता है. वहां से चालान भरने वाले डीड राइटर को नियमानुसार स्टांप उपलब्ध करा दी जाती है और पावती के रूप में रजिस्टर पर हस्ताक्षर करते हैं. इस तरह उपरोक्त अवधि में पदस्थापित कोषागार पदाधिकारियों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता है. सभी प्रकार के रजिस्टर पर इन दोनों का ही लघु हस्ताक्षर पाया गया है. अनुसेवक मोहन कुमार का हस्ताक्षर नहीं पाया गया है, परंतु इनके द्वारा कोषागार पदाधिकारी/लेखापाल के आदेशानुसार ही कार्य का संपादन किया जाता था.सभी आरोपी हैं फरारस्टांप घोटाले में मामला जो दर्ज हो गया है, पर आज तक एक भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है. एएसपी ने अपनी रिपोर्ट में कांड के अनुसंधान कर्ता को निर्देश दिया है कि सभी नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी हो नहीं तो इनके घर की कुर्की जब्ती करने के लिए आदेश लिया जाये. साथ ही तत्कालीन चारों कोषागार पदाधिकारी के खिलाफ साक्ष्य जुटाये जायें. वहीं वित्त विभाग के द्वारा भी मामले की जांच की जा रही है उसकी भी रिपोर्ट लें.

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