जेएमडीसी की उदासीनता से 58 खदानें बंद, हजारों लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट

Mines Closed: झारखंड राज्य खनिज विकास निगम की 58 खदानें वर्षों से बंद हैं, जिससे हजारों मजदूरों और उनसे जुड़े व्यवसायों की रोजी-रोटी संकट में है. प्रशासनिक सुस्ती, तकनीकी पिछड़ापन और लंबित मंजूरियों के कारण राज्य को भी भारी राजस्व नुकसान हो रहा है. नीचे पूरी खबर पढ़ें.

रांची से सुनील चौधरी की रिपोर्ट

Mines Closed: झारखंड राज्य खनिज विकास निगम (जेएसएमडीसी) की प्रशासनिक उदासीनता और नीति स्तर पर लापरवाही का खामियाजा हजारों मजदूरों और उनके परिवारों को भुगतना पड़ रहा है. निगम के अधीन संचालित 58 खदानें वर्षों से बंद पड़ी हैं. न तो इन्हें समय पर चालू करने की ठोस पहल हुई और न ही मजदूरों के भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट नीति बनाई गई. नतीजा यह है कि खनिज संपदा से भरपूर राज्य में बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली लगातार बढ़ रही है.

खदान बंद होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर

खदानों के बंद होने का असर सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं है. खनन पर निर्भर ट्रांसपोर्टर, ढाबा संचालक, छोटे दुकानदार, ठेका श्रमिक और स्थानीय सेवा प्रदाता भी बुरी तरह प्रभावित हैं. जिन इलाकों में कभी खनन गतिविधियों के कारण आर्थिक चहल-पहल रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है. खदानें बंद होने से जहां मजदूरों के हाथों से काम छूटा है, वहीं राज्य सरकार को भी भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है.

जेएसएमडीसी की बदहाली के कारण

जेएसएमडीसी की स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई है. हर छह महीने में अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का बदलना निगम की अस्थिरता को दर्शाता है. खान विभाग के सचिव और निदेशक के अतिरिक्त प्रभार में यह पद बीते 10-12 वर्षों से चल रहा है, जिनकी प्राथमिकताओं में जेएसएमडीसी को मजबूत करना कभी शामिल नहीं रहा. निगम में सरकारी दखल जरूरत से ज्यादा है, जिससे निर्णय प्रक्रिया धीमी हो जाती है.

तकनीकी पिछड़ापन और भरोसे की कमी

पड़ोसी राज्यों ओडिशा और छत्तीसगढ़ के खनिज विकास निगमों की तुलना में जेएसएमडीसी तकनीकी रूप से काफी पीछे है. यहां खनन के लिए जारी की जाने वाली निविदाएं इतनी जटिल और अव्यवहारिक होती हैं कि अच्छे ठेकेदार इसमें रुचि नहीं लेते. जो ठेकेदार आते भी हैं, उनका भुगतान वर्षों तक अटका रहता है. यही वजह है कि बाजार में निगम की साख लगातार गिरती चली गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि जेएसएमडीसी पर अब किसी का भरोसा नहीं बचा है.

फॉरेस्ट क्लीयरेंस बना बड़ी बाधा

वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डॉ अनिल सिन्हा के अनुसार, पहले कई खदान परियोजनाओं में फॉरेस्ट क्लीयरेंस का प्रावधान नहीं था. लेकिन 1996 में यह नियम लागू होने के बाद बेंटी बगदा लाइम स्टोन खदान और ज्योति पहाड़ी क्यानाइट परियोजना बंद करनी पड़ी. यदि समय रहते प्रयास किए जाते, तो ये परियोजनाएं आज भी चालू हो सकती थीं.

बंद खदानों को दोबारा चालू करने की कोशिश

सरकारी स्तर पर अब बंद खदानों को फिर से चालू करने के लिए माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर (एमडीओ) चयन की प्रक्रिया शुरू की गई है. एमडीओ के माध्यम से पॉल्यूशन क्लीयरेंस और अन्य जरूरी अनुमतियां लेने का प्रयास किया जा रहा है. जेएसएमडीसी ने ज्योति पहाड़ी क्यानाइट, बेंटी बगदा लाइम स्टोन और चंदुला स्टोन परियोजना को दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी है.

संसाधन और स्टाफ की कमी दूर करने की पहल

पहले जेएसएमडीसी के पास माइनिंग का आवश्यक स्टाफ तक नहीं था. अब जीएम माइंस की नियुक्ति की गई है और एडवाइजर भी रखे गए हैं. अन्य रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया जारी है. निगम के एमडी राहुल कुमार सिन्हा का कहना है कि कसकनी परियोजना जल्द ही चालू हो जाएगी और इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

कसकनी कोल प्रोजेक्ट पर अटकी कागजी कार्रवाई

कसकनी गांव के समीप स्थित जेएसएमडीसी का कसकनी कोल प्रोजेक्ट अभी भी कागजी प्रक्रियाओं में उलझा हुआ है. खनन कंपनी के चयन को लेकर टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और गोदावरी कमोडिटीज लिमिटेड को यहां रेजिंग का कार्य मिला है. हालांकि, अब तक खनन कार्य शुरू नहीं हो सका है.

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स्थानीय लोगों को फिर जगी उम्मीद

खान अभियंता उमेश कुमार के अनुसार, कागजी कार्रवाई प्रक्रिया में है और जल्द ही खनन कार्य शुरू होगा. कसकनी ट्रक ऑनर एसोसिएशन के अध्यक्ष लाल रंजन नाथ शाहदेव का कहना है कि कसकनी कोलियरी के खुलने से पूरे क्षेत्र में नई उम्मीद जगेगी और हजारों लोगों को फिर से रोजगार मिलेगा.

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By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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