झारखंड के जंगलों में पैसा उगल रहा पीला सोना, लोगों को मिला रोजगार

Jharkhand Mahua: झारखंड के जंगलों में महुआ को पीला सोना कहा जाता है, जो ग्रामीणों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन गया है. मार्च-अप्रैल में बंपर उत्पादन से लाखों की आमदनी होती है. आदिवासी महिलाएं महुआ से आत्मनिर्भर बन रही हैं और इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

Jharkhand Mahua: झारखंड के जंगलों में इन दिनों ‘पीला सोना’ कहे जाने वाले महुआ की बहार छाई हुई है. मार्च और अप्रैल के महीने में महुआ के फूल पेड़ों से गिरते हैं, जिसे ग्रामीण बड़े पैमाने पर इकट्ठा करते हैं. यह समय पूरे राज्य के लिए आर्थिक समृद्धि का सीजन माना जाता है. खासकर साहिबगंज जिले में महुआ उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है.

बंपर उत्पादन से लाखों की आमदनी

मार्च के दूसरे सप्ताह से लेकर अप्रैल के अंत तक जिले में महुआ का बंपर उत्पादन होता है. बरहेट, बोरियो, बरहरवा, साहिबगंज, राजमहल, तालझारी और उधवा जैसे इलाकों में महुआ के सैकड़ों पेड़ मौजूद हैं. अनुमान के मुताबिक डेढ़ महीने के भीतर जिले में करीब एक करोड़ रुपये से अधिक का महुआ उत्पादन हो जाता है. खास बात यह है कि इसके लिए ग्रामीणों को किसी तरह की पूंजी निवेश करने की जरूरत नहीं पड़ती.

आदिवासी महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का जरिया

महुआ संग्रहण में आदिवासी महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. सुबह-सुबह महिलाएं जंगलों में जाकर महुआ के फूल चुनती हैं और उसे सुखाकर बाजार में बेचती हैं. इससे उन्हें अच्छी आमदनी होती है. कई परिवारों के लिए यह आय का मुख्य स्रोत बन चुका है. महुआ ने ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है.

रोजगार का मौसमी लेकिन मजबूत विकल्प

महुआ का सीजन ऐसे समय में आता है, जब ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर कम होते हैं. ऐसे में महुआ संग्रहण लोगों के लिए रोजगार का एक मजबूत विकल्प बन जाता है. इससे हजारों लोगों को अस्थायी ही सही, लेकिन अच्छी आमदनी मिलती है. जंगलों पर निर्भर समुदाय के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है.

महुआ के कई इस्तेमाल

महुआ सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि बहुउपयोगी संसाधन है. इससे पारंपरिक पेय पदार्थ (महुआ शराब) तैयार किया जाता है, वहीं इसके फूल और बीज औषधीय उपयोग में भी आते हैं. महुआ के बीजों को सुखाकर उससे तेल निकाला जाता है, जो खाने, दवा और मालिश के काम आता है. इसके अलावा इस तेल का उपयोग दीया जलाने में भी किया जाता है.

पर्यावरण संरक्षण में भी अहम योगदान

महुआ के पेड़ न केवल आर्थिक लाभ देते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ग्रामीण इन पेड़ों की देखभाल करते हैं, जिससे जंगल सुरक्षित रहते हैं. इससे प्राकृतिक संतुलन बना रहता है और जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलता है.

पहाड़ी क्षेत्रों में महुआ का विशेष महत्व

बरहेट प्रखंड के हिरणपुर, सिमड़ा, बाघमारा, भोगनाडीह, तलबड़िया और सनमनी जैसे सुदूरवर्ती गांवों में महुआ के पेड़ों की भरमार है. खास बात यह है कि साहिबगंज जिले में महुआ के पेड़ पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जिससे इसकी गुणवत्ता और महत्व और भी बढ़ जाता है. यही कारण है कि यहां का महुआ बाजार में खास पहचान रखता है.

इसे भी पढ़ें: सरायकेला के मोहितपुर में श्रद्धा-उल्लास के साथ निकला रामनवमी जुलूस, अर्जुन मुंडा भी हुए शामिल

‘पीला सोना’ बदल रहा ग्रामीण जीवन

महुआ का सीजन झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं है. बिना लागत के मिलने वाली यह प्राकृतिक संपदा लोगों की जिंदगी में खुशहाली ला रही है. रोजगार, आय और पर्यावरण संरक्षण तीनों मोर्चों पर महुआ ने अपनी अहम भूमिका साबित की है.

इसे भी पढ़ें: महिलाओं को हेमंत सोरेन सरकार का रामनवमी तोहफा, खाते में आ गया मंईयां सम्मान का पैसा

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >