नशे के खिलाफ उठी आवाज, गांव-गांव पहुंचा बदलाव का कारवां, जानें सामाजिक क्रांति की मिसाल बनीं शांतिलता की कहानी

एक महिला की असाधारण कहानी जिसने अपने गांव को नशे, घरेलू हिंसा और प्लास्टिक के कचरे से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया. शांतिलता टुडू ने कैसे लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं, यह जानने के लिए पढ़ें.

जमशेदपुर : एक गांव की महिला जब अपने आसपास के समाज में बदलाव का सपना देखती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है - लोगों की सोच बदलना. लेकिन पूर्वी सिंहभूम के सुंदरनगर क्षेत्र के तालसा गांव की शांतिलता टुडू ने इसी चुनौती को अपना मिशन बना लिया. जहां शराब और नशे के कारण परिवार बिखर रहे थे, वहां उन्होंने महिलाओं को एकजुट किया. जहां घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न आम समस्या बन रही थी, वहां उन्होंने आवाज उठायी. जहां प्लास्टिक गांवों की गलियों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा था, वहां उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को जागरूक किया। और जहां महिलाएं आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर थीं, वहां उन्होंने स्वयं सहायता समूहों के जरिए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश शुरू की.

जागरूक करतीं शांतिलता टुडू.

समाज की समस्याओं को देखकर शुरू हुआ सफर

शांतिलता का सफर किसी बड़े बजट या सरकारी योजना से नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं को करीब से देखकर शुरू हुआ. आज तालसा से लेकर आसपास के दर्जनों गांवों तक उनका नाम सामाजिक बदलाव की एक ऐसी कहानी से जुड़ गया है, जिसमें नशामुक्ति, महिला सशक्तीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण एक साथ दिखाई देते हैं. जब शराब ने गांवों के घरों में दस्तक दी, तब महिलाओं ने संभाली कमान शांतिलता ने अपने आसपास के गांवों में शराब के कारण होने वाले झगड़े और पारिवारिक तनाव को करीब से देखा. कई परिवारों में नशा आर्थिक परेशानी के साथ-साथ हिंसा का भी कारण बन रहा था.

गांव की महिलाओं से शुरू की बातचीत

उन्होंने तय किया कि सिर्फ समस्या की शिकायत करने से बदलाव नहीं आएगा. उन्होंने गांव की दूसरी महिलाओं से बातचीत शुरू की. धीरे-धीरे महिलाएं उनके साथ जुड़ने लगीं. बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ और नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया गया. इस अभियान का उद्देश्य केवल शराब का विरोध करना नहीं था, बल्कि लोगों को यह समझाना भी था कि नशे का असर पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी पर पड़ता है. धीरे-धीरे अभियान का दायरा बढ़ता गया. कई युवाओं को नशे की राह से वापस लाने की कोशिश की गयी.

घरेलू हिंसा के खिलाफ बनीं महिलाओं की आवाज

घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न के मामलों में उन्होंने परिवारों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश की. कई मामलों में समझाइश के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया गया. जहां जरूरत पड़ी, वहां महिलाओं को उनके अधिकार और कानून की जानकारी भी दी गयी. उनकी कोशिश रही कि महिलाएं डरकर चुप न रहें, बल्कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं. इसी सोच ने शांतिलता को गांव की महिलाओं के बीच भरोसेमंद आवाज बना दिया.

जागरूक करतीं शांतिलता टुडू.

प्लास्टिक के खिलाफ गांव-गांव चली मुहिम

समाज में बदलाव के साथ शांतिलता ने पर्यावरण को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाया. प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल से पर्यावरण और मवेशियों पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए उन्होंने गांवों में प्लास्टिक-मुक्त अभियान शुरू किया. ब्यांगबिल, रानीडीह, मतलाडीह, मुईगुट्टू, बांदूहुडांग, भूरीडीह, भीतरदाड़ी, बाहरदाड़ी, बेड़ाढीपा, जगन्नाथपुर और नागाडीह जैसे इलाकों में घर-घर जाकर लोगों से प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने की अपील की गयी. लोगों को कपड़े के थैले इस्तेमाल करने और गांवों को साफ रखने के लिए प्रेरित किया गया. यानी जिस मुहिम की शुरुआत समाज को नशे से बचाने के लिए हुई थी, वह धीरे-धीरे पर्यावरण संरक्षण तक पहुंच गयी.

महिलाओं के हाथों में थमाया आत्मनिर्भरता का रास्ता

शांतिलता का मानना है कि महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करना जरूरी है. इसी सोच के साथ उन्होंने गांवों में महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ना शुरू किया. महिलाओं को संगठित किया गया और सरकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश की गयी. कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली कई महिलाएं छोटी-छोटी बचत और कुटीर उद्योगों के जरिए परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ीं.

शिक्षा व स्वास्थ्य को भी बनाया अभियान का हिस्सा

शांतिलता ने महसूस किया कि केवल नशामुक्त समाज बनाना पर्याप्त नहीं है. अगर गांव के बच्चों को शिक्षा और परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं किया गया, तो विकास अधूरा रहेगा. इसके बाद उन्होंने सुंदरनगर, तालसा, पुरीहासा, कुदादा, इंद्राबस्ती, नांदूप, नीलडुंगरी, ब्यांगबिल, रानीडीह, मतलाडीह, मुईगुट्टू, बांदूहुडांग, भूरीडीह, भीतरदाड़ी, बाहरदाड़ी, बेड़ाढीपा, जगन्नाथपुर, नागाडीह, करनडीह और गैंताडीह समेत कई ग्रामीण इलाकों में चौपाल और बैठकों के जरिए लोगों को जागरूक करना शुरू किया. शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, नशामुक्ति और महिला अधिकार जैसे मुद्दों पर लगातार बातचीत की गयी.

अकेली शांतिलता नहीं, अब बन चुका है पूरा कारवां

शांतिलता की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उनका अभियान अब सिर्फ उनका व्यक्तिगत प्रयास नहीं रहा. जिस काम की शुरुआत कुछ महिलाओं के साथ बातचीत से हुई थी, उसमें धीरे-धीरे लोग जुड़ते चले गए. आज उनके साथ काम करने वाली महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक समूह गांवों में जागरूकता फैलाने में जुटा है. एक आवाज से शुरू हुआ अभियान धीरे-धीरे कारवां बन गया. यही वजह है कि शांतिलता टुडू का नाम अब केवल तालसा गांव तक सीमित नहीं है. उनका काम पूर्वी सिंहभूम के ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक बदलाव की प्रेरक कहानी बन चुका है.

मैंने वही किया, जो मुझे दिल से सही लगा : शांतिलता

अपने काम को लेकर शांतिलता टुडू कहती हैं कि उन्होंने किसी पर कोई अहसान नहीं किया. उन्होंने वही किया, जो उन्हें दिल से सही लगा. वह बताती हैं कि जब वह गांव में लोगों को शराब के नशे में आपस में लड़ते-झगड़ते देखती थीं, तो उन्हें बहुत दुख होता था. उन्होंने इस विषय पर गांव की महिलाओं से बात की. बातचीत में पता चला कि दूसरी महिलाएं भी इसी समस्या से परेशान थीं. इसके बाद महिलाओं को एकजुट करने का सिलसिला शुरू हुआ.

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लेखक के बारे में

By दशमत सोरेन

दशमत सोरेन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया है. वे 29 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से झारखंड की आदिवासी-मूलवासी राजनीति, स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति और यहां के सामाजिक ताना-बाना है. वे वर्ष 2010 से प्रभात खबर के साथ एक ट्राइबल रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं.

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