जिस तरह बाबा धाम की 105 किमी लंबी नंगे पांव पवित्र कांवर यात्रा धर्म के साथ ही समाजवाद की एक अद्भुत/आदर्श परिकल्पना है. यहां की व्यवस्था में न जाति, न धर्म, सब बराबर है. उसी तरह श्रावण की तीसरी सोमवारी पर शहर के तमाम शिवालयों में श्रद्धालुओं के अपार जनसैलाब ने हर भेदभाव को मिटा दिया. हर-हर महादेव और बोल बम के जयघोषों के बीच तड़के से ही शिव भक्तों ने देवाधिदेव महादेव का विधि-विधान से जलाभिषेक किया.
जलाभिषेक यात्रा के दौरान पूरा शहर शिवमय नजर आया. जहां सिर्फ और सिर्फ एक्य का भाव हो, वहां शिवत्व का बोध तो होना ही है और इस यात्रा का उद्देश्य भी यही है, समाज को एक सूत्र में बांधना. कतार में लगे हर श्रद्धालु के भीतर केवल शिवत्व का भाव नजर आ रहा था. स्वयंसेवक भी पूरी मुस्तैदी के साथ डटे रहे, ताकि यात्रा में शामिल अंतिम श्रद्धालु तक सुलभता से जल अर्पित कर सके. धार्मिक आस्था और भक्ति का यह अनुपम दृश्य शहर में सामाजिक समरसता, समानता और अटूट भाईचारे की मिसाल बन गया.
समाजवाद का अद्भुत स्वरूप है कांवर यात्रा
सावन शुरू होते ही विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में एक माह तक सुल्तानगंज (बिहार) से बाबा वैद्यनाथ की नगरी देवघर (झारखंड) तक आस्था का महासमुंद्र उमड़ पड़ता है और इसमें गोते लगाती है कांवरियों की महाआस्था, परंपराओं से बंधी बाबा धाम कांवर यात्रा की शुचिता और पवित्रता के साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक गरिमा भी है. जब संग में मां गंगा हों और रास्ते में हर सहयात्री शिव के रूप में हों. यात्रा में सबके नाम एक होते हैं यानि सभी 'बम' हैं.
सबका नारा एक होता हैं 'बोल बम'. सबके कपड़े एक होते हैं- 'गेरुआ'. सबका दर्द एक होता है यानि पैर में छाले व असह्य पीड़ा और सबकी दवा भी एक होती है- 12 ज्योतिर्लिंग में सर्वाधिक महिमामंडित बाबा वैद्यनाथ कामना लिंग पर जलाभिषेक. महादेव को जल चढ़ाते ही कष्ट गायब. सहिष्णुता ऐसी की रास्ते में कुत्ते मिल जायें तो उसे भी कांवरिये 'भैरव बम' के नाम से पुकारते हैं. यानी, समाजवाद की एक अद्भुत व आदर्श परिकल्पना है कांवर यात्रा.
