बिष्टुपुर गोपाल मैदान में आदिवासी सेमलेद-2026 का आयोजन
Jamshedpur News :
बिष्टुपुर गोपाल मैदान एक बार फिर साक्षी बना उस ऊर्जा का, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सुंदर सेतु तैयार कर रही है. आदिवासी युवा संगठन द्वारा गुरुवार को आयोजित ”आदिवासी सेमलेद-2026” केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आंदोलन की तरह उभरा है. इस सम्मेलन ने यह साबित कर दिया कि कोल्हान के आदिवासी युवा अब केवल भविष्य के सपने नहीं देख रहे, बल्कि अपनी समृद्ध विरासत को साथ लेकर नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.जहां भी रहेंगे, जड़ों से जुड़े रहेंगे
अक्सर यह चिंता जतायी जाती है कि शहर की ओर पलायन करने वाली युवा पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल जाती है. लेकिन गोपाल मैदान में जुटी भीड़ ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया. सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य उन युवाओं को दोबारा अपनी मिट्टी से जोड़ना था, जो शिक्षा या रोजगार के लिए शहरों में बस गये हैं. वक्ताओं ने कहा कि शहर में रहना और दुनिया के साथ चलना जरूरी है, लेकिन अपनी भाषा, लिपि और परंपराओं को छोड़ देना समाज के अस्तित्व के लिए खतरा है. इसलिए वे जहां कहीं भी रहेंगे अपनी जड़ से जुड़े रहेंगे.शिक्षा से कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प
सेमलेद-2026 की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि यहां एक ओर जहां युवा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक शिक्षा पर चर्चा कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर मांदर की थाप पर उनके कदम अपनी सदियों पुरानी संस्कृति से कदमताल मिला रहे थे. शिक्षा के माध्यम से समाज की कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प यहां हर छात्र की आंखों में स्पष्ट दिखाई दे रहा था. यह सम्मेलन संदेश था कि आदिवासी युवा अब पिछड़ने के लिए नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में नेतृत्व करने के लिए अपनी जमीन तैयार कर चुका है.
युवाओं ने अपने विचारों का किया आदान-प्रदान
इस सम्मेलन में कोल्हान प्रमंडल के विभिन्न कॉलेजों से आये विद्यार्थियों ने मंच साझा किया. यहां केवल नृत्य और संगीत ही नहीं था, बल्कि गहन विमर्श भी था. युवाओं ने नेतृत्व क्षमता पर अपने विचार रखे. उन्होंने इस बात पर चर्चा की कि कैसे एक आदिवासी छात्र प्रशासनिक सेवाओं, तकनीक और राजनीति में अपनी जगह बना सकता है. आदिवासी युवा सम्मेलन का यह मंच युवाओं के आत्मविश्वास को नयी ऊंचाइयों पर ले जाने का एक सशक्त माध्यम बना.बंगाल व ओडिशा के कलाकारों ने लोक गीतों से बांधा समां
पारंपरिक परिधानों में सजे युवाओं ने मंच पर सांस्कृतिक अस्मिता का प्रदर्शन किया. पारंपरिक नृत्य और गीतों के माध्यम से पूर्वजों के संघर्ष और प्रकृति के प्रति प्रेम को दर्शाया गया. रुपाली हेंब्रम, लोगेन, डीसर, रुपाली हांसदा व खेलाराम समेत अन्य गायक व गायिकाओं ने लोक गीत-संगीत पर युवाओं को झुमाया. इन प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि आदिवासी संस्कृति केवल प्रदर्शन की वस्तु नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक ऐसा तरीका है जो दुनिया को ””””सस्टेनेबल लिविंग”””” सिखा सकता है.
अपनी सफलता का लाभ समुदाय को लौटाने का आह्नवान
वर्तमान समय में वैश्वीकरण के दौर में अपनी पहचान बचाये रखना एक बड़ी चुनौती है. कार्यक्रम में इस बात पर गंभीर चर्चा हुई कि यदि युवा अपने पैतृक गांवों से नाता तोड़ लेंगे, तो पूर्वजों द्वारा सहेजी गयी भाषा और ज्ञान का भंडार लुप्त हो जायेगा. आदिवासी युवा संगठन के अध्यक्ष हरिराम टुडू व उपाध्यक्ष-अरूण मुर्मू ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी सफलता का श्रेय अपने पूर्वजों के संघर्ष को दें और अपनी सफलता का लाभ अपने समुदाय को वापस लौटाएं.
इन कॉलेजों के छात्र हुए शामिल
– जमशेदपुर कॉ-ऑपरेटिव कॉलेज
-जमशेदपुर महिला कॉलेज-एलबीएसएम कॉलेज करनडीह-घाटशिला कॉलेज घाटशिला-केसी साहू कॉलेज, सरायकेला
-टाटा कॉलेज चाईबासा-छोटानागपुर कॉलेज, हातायुवाओं के बोल
शिक्षा ही वह चाबी है जिससे हमारे समाज की उन्नति के बंद दरवाजे खुलेंगे. मैं चाहता हूं कि हमारे समाज का हर बच्चा केवल साक्षर न बने, बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर बड़े पदों पर काबिज हो. जब हम शिक्षित होंगे, तभी हम अपने अधिकारों और पूर्वजों की धरोहर की रक्षा बेहतर ढंग से कर पायेंगे.-हरिराम टुडू, अध्यक्ष, आदिवासी युवा संगठन
हमारी संस्कृति हमारी सांस है. अगर हम अपनी भाषा और लोकगीतों को भूल गये, तो हमारा अस्तित्व खत्म हो जायेगा. मैं आधुनिक संगीत के साथ-साथ अपनी पारंपरिक धुनों को भी सहेज रहा हूं. हमें आधुनिक जरूर बनना है, लेकिन अपनी जड़ों को छोड़कर नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर दुनिया जीतनी है.-अरूण कुमार, उपाध्यक्ष, आदिवासी युवा संगठन
नेतृत्व का मतलब केवल राजनीति नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना है. आज की आदिवासी महिला हर क्षेत्र में काबिज हो रही है. हम प्रगति की दौड़ में किसी से पीछे नहीं हैं. खेल से लेकर विज्ञान तक, हम अपनी छाप छोड़ रहे हैं. हमें बस अपनी क्षमताओं पर विश्वास और आपसी एकता की जरूरत है.-प्रतिमा मुर्मू
हमारे पूर्वजों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपना लहू बहाया है. आज वह धरोहर हमारे हाथ में है. शहर में रहकर भी मैं अपने गांव की मिट्टी की खुशबू नहीं भूला हूं. हमारी परंपराएं हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाती हैं, जो आज की दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है.-बुधराम बेसरा, सचिव, आदिवासी युवा संगठन
अब वह समय चला गया जब हमें सिर्फ हाशिये पर देखा जाता था. आज का आदिवासी युवा कॉरपोरेट ऑफिस से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है. हमें अपनी पहचान को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाना चाहिए. हमारी ईमानदारी और मेहनत ही हमें हर क्षेत्र में सफल बनायेगी.-कमलिका मुर्मू
अक्सर युवा शहर जाकर वापस नहीं लौटते, यह दुखद है. मैं मानती हूं कि हमें अपनी सफलता का दीया अपने गांव में भी जलाना चाहिए. जब तक हम अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे, हमारा समाज सुरक्षित रहेगा. सामुदायिक विकास ही हमारी असली प्रगति है, और इसके लिए हम युवाओं को आगे आना होगा.
