कोल्हान के बोड़ाम में स्थित प्रसिद्ध हाथीखेदा मंदिर में हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. साल के 365 दिनों में 363 दिन मंदिर में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं. मई के पहले सप्ताह में लावजोड़ा गांव के शिव मंदिर में होने वाली शिव पूजा के दौरान दो दिनों तक हाथीखेदा मंदिर में पूजा-पाठ और बलि बंद रहती है.
स्थानीय लोगों के बीच हाथीखेदा देवता को जागृत देवता के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त है. मान्यता है कि भक्त उपवास रखकर सच्चे मन से यहां मन्नत मांगते हैं तो उनकी मनोकामना पूरी होती है. इसी विश्वास के साथ लोग अपनी अलग-अलग समस्याओं से निजात पाने के लिए हाथीखेदा देवता की शरण में पहुंचते हैं.
मंदिर के प्रसाद को लेकर भी है खास परंपरा
हाथीखेदा मंदिर की एक खास परंपरा यहां मिलने वाले प्रसाद से जुड़ी है. मंदिर का प्रसाद महिलाएं ग्रहण नहीं करती हैं, ऐसा माना जाता है की इससे वे बेसुध हो जाती है. साथ ही यहां के प्रसाद को घर ले जाने की भी अनुमति नहीं है.
आसपास के गांवों में किसी भी तरह का शुभ कार्य होने पर हाथीखेदा मंदिर में पूजा-अर्चना करने की परंपरा है. चाहे मामला राजनीतिक हो, पारिवारिक या सामाजिक, शुभ कार्य से पहले यहां पूजा की जाती है.
पेड़ों पर नारियल बांधकर मांगते हैं मन्नत
हाथीखेदा मंदिर में झारखंड के अलावा बंगाल और ओडिशा समेत कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर परिसर में मौजूद पेड़-पौधों पर भक्त नारियल बांधकर परिवार की सुख-समृद्धि के लिए मन्नत मांगते हैं.
मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु पेड़ पर बंधे नारियल को फोड़कर अपनी रस्म पूरी करते हैं. मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में नारियल बंधे हुए देखे जा सकते हैं.
पक्की व्यवस्था के बीच पेड़ के नीचे होती है पूजा
मंदिर परिसर में चारों ओर पक्की और व्यवस्थित व्यवस्था है, लेकिन हाथीखेदा देवता का देवस्थल आज भी पेड़ के नीचे खुले आसमान में है. यहीं मंदिर के पुजारी श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाए गए प्रसाद की पूजा करते हैं.
भक्त यहां मिट्टी के अलावा तांबा, पीतल, लोहा, एल्युमिनियम और चांदी जैसी धातुओं से बने हाथी और घोड़े भी चढ़ाते हैं.
फसल बचने की मान्यता से जुड़ी है आस्था
गांव के बुजुर्गों के अनुसार प्राचीन समय में यह पूरा इलाका दलमा जंगल से घिरा हुआ था. उस समय जंगली हाथियों से किसानों की फसल को नुकसान पहुंचता था. मान्यता है कि हाथीखेदा देवता की पूजा करने के बाद धान की फसल हाथियों से बच जाती थी. इसी वजह से आसपास के गांवों के लोगों में हाथीखेदा देवता के प्रति गहरी आस्था बनी हुई है.
रविवार और बुधवार को उमड़ती है ज्यादा भीड़
मंदिर के मुख्य पुजारी गिरजा प्रसाद सिंह बताते हैं कि उनके पूर्वजों के समय से ही हाथीखेदा देवता की पूजा होती आ रही है. उनसे पहले उनके पिता लखीकांत सिंह, दादा रूप सिंह और अर्जुन सिंह लाया समेत परिवार के अन्य लोग पूजा-अर्चना करते रहे हैं.
उन्होंने बताया कि मंदिर में हर दिन श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है लेकिन रविवार और बुधवार को भक्तों की संख्या सबसे अधिक होती है. मंदिर से होने वाली आय से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर के सुंदरीकरण का काम भी जारी है.
