धालभूमगढ़ : धालभूमगढ़ प्रखंड के मोहलीशोल गांव में मंगलवार को मनसा पूजा के अवसर पर झापान का आयोजन किया गया है. सदियों पुरानी इस परंपरा को लेकर गांव में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. मान्यता है कि 17वीं शताब्दी में गांव के बसने के साथ ही यहां मनसा पूजा की शुरुआत हुई थी. आज भी गांव के लगभग हर घर में मां मनसा की पूजा-अर्चना की जाती है.
विषधर नागों को गले में डालकर दिघी बांध तक जाएंगे
झापान के दौरान श्रद्धा, परंपरा और रोमांच का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं. परंपरा के अनुसार पहले दिन झापान बने लोग पूजा-अर्चना के बाद विषधर नागों को गले में डालकर लकड़ी की विशेष पालकी पर सवार होकर दिघी बांध तक जाते हैं. वहां नागों को स्नान कराने के बाद पूजा-अर्चना की जाती है और घट लाया जाता है. इसके बाद पूजा-अर्चना और मनसा मंगल के गायन के बीच झापान की रस्म शुरू होती है.
लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र
परंपरागत रूप से पान के पत्ते में एक विशेष जड़ी रखकर मुंह में डालने और नागों को गले में लपेटने की परंपरा निभाई जाती है. इस दौरान विषधर सांपों के साथ झापान का प्रदर्शन लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है. ग्रामीणों के अनुसार गांव के कई लोग विषधर नागों के व्यवहार और उनके काटने पर किए जाने वाले पारंपरिक उपचार की जानकारी रखते हैं. हालांकि, विषैले सांपों को पकड़ना, उनसे छेड़छाड़ करना या उनके काटने का घरेलू उपचार करना बेहद खतरनाक हो सकता है. सर्पदंश की स्थिति में तत्काल अस्पताल ले जाना ही सुरक्षित कदम है.
तीन दिनों तक होती है पूजा
मनसा पूजा का आयोजन तीन दिनों तक चलता है. पहले दो दिनों में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जबकि तीसरे दिन घट विसर्जन के साथ पूजा का समापन होता है. इस बार भी आयोजन को लेकर गांव में उत्साह चरम पर है. मोहलीशोल में मंगलवार को जब पालकी उठेगी और गले में नजर आएंगे विषधर नाग, तो लोगों की निगाहें उस रोमांचक झापान पर टिक जाएंगी.
