वन विभाग की टीम ने जांच प्रक्रिया के सभी दस्तावेज कब्जे में लिये
जमशेदपुर : टाटा स्टील जूलॉजिकल पार्क (चिड़ियाघर) में बचे बाघों में बेबिसिओसिस के लक्षण नहीं पाये गये हैं. वन विभाग ने बाघों की मौत और इलाज को लेकर अपनायी गयी प्रक्रिया से जुड़े सभी दस्तावेज जू प्रबंधन से अपने कब्जे में ले लिया है.
दस्तावेज से यह खुलासा हुआ है कि ब्लड रिपोर्ट आने से पूर्व ही बीमार बाघ शावक को बेबिसिओसिस की दवा दे दी गयी थी. 15 मार्च को एक शावक बीमार पड़ा था, उसका ब्लड खासमहल के लैब में भेजा गया था. 16 मार्च को जांच रिपोर्ट आयी, जिसमें बेबिसिओसिस की पुष्टि की गयी थी. वहीं इलाज की प्रक्रिया बता रही है कि 15 मार्च को ही शावक को चिड़ियाघर प्रबंधन ने बेबिसिओसिस के उपचार की दवा दे दी थी. इसके बाद 18 मार्च को भी एक रिपोर्ट आयी. इस बीच 19 मार्च से लगातार तीन बाघों की मौत हो गयी.
बाघों की जांच व इलाज के लिए अपनी गयी प्रक्रिया में चिड़ियाघर प्रबंधन ने बताया है कि 15 मार्च को ही बारानिल, एविक, विटामिन ए और विटालजिन जैसी दवाएं दे दी गयी थी. इसमें मुख्य बारानिल दवा है, जिसका इस्तेमाल बेबिसिओसिस में किया जाता है. अभी जो बाघ जू में है, उनके ब्लड सैंपल की रिपोर्ट में बेबिसिओसिस नहीं होने की पुष्टि की गयी है.
बेबिसिओसिस में खून सूख जाता है, पोस्टमार्टम में ब्लड निकला था. वन विभाग को मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि गले पर चीरा लगाने के समय काफी खून निकला था, जबकि बेबिसिओसिस में खून सूख जाता है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी बेबिसिओसिस से मौत नहीं होने की पुष्टि हुई है.
चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डेन पर निगाहें. राज्य के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डेन पर को पूरी रिपोर्ट डीएफओ शबा आलम अंसारी ने भेजी है. रिपोर्ट में इलाज में लापरवाही का जिक्र है. चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डेन अभी लखनऊ के दौरे पर है. उम्मीद जतायी जा रही है कि वहां से लौटकर वह जरूरी कार्रवाई करेंगे.
जिप उपाध्यक्ष ने की कार्रवाई की मांग
जिला परिषद के उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह ने गुरुवार को डीएफओ से मिलकर जू प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. डीएफओ के सौंपे पत्र में उन्होंने कहा कि 20 साल से जू एक ही चिकित्सक के भरोसे चल रहा. यहां लैब व अस्पताल नहीं है. उन्होंने राष्ट्रीय व संरक्षित पशु बाघ को लेकर जू में बरती गयी लापरवाही के लिए दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है.
