चुआं खोद ग्रामीण पीते हैं पानी

रवींद्र कुमार सिंह हजारीबाग : हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी के अंदर रहनेवाला आदिवासी समाज आजादी के 70 साल बाद भी आदिम युग में जी रहा है. पेट भरने की व्यवस्था तो यहां रहनेवाले परिवार के लिए हो जाती है, लेकिन पीने व भोजन बनाने के लिए पानी की व्यवस्था करने में इन्हें काफी परेशानी होती […]

रवींद्र कुमार सिंह
हजारीबाग : हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी के अंदर रहनेवाला आदिवासी समाज आजादी के 70 साल बाद भी आदिम युग में जी रहा है. पेट भरने की व्यवस्था तो यहां रहनेवाले परिवार के लिए हो जाती है, लेकिन पीने व भोजन बनाने के लिए पानी की व्यवस्था करने में इन्हें काफी परेशानी होती है. जंगल के अंदर डुमरी गांव इलाके में बसे करीब एक दर्जन आदिवासी परिवार नदी किनारे से चुआं खोद कर (मिट्टी हटाकर) पानी निकालते हैं और अपनी प्यास बुझाते हैं.
इनके समक्ष जल संकट की समस्या अभी भी बरकरार है. डुमरी के इन आदिवासी परिवार के लोगों को जंगली जानवरों का भय भी सताता है. इसी बीच उन्हें जाड़े और गरमी के मौसम में भोजन बनाने, पीने, नहाने और कपड़ा धोने के लिए पानी का जुगाड़ नदी किनारे जमीन खोद कर करना पड़ता है. आमतौर पर जमीन से चुअां का पानी जानवर के पीने के लायक भी नहीं होता है, लेकिन इनके पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है.
बरसात के दिन में नदी का गंदा पानी इन्हें पीना पड़ता है.लंबे समय से चापानल खराब: इन आदिवासी परिवार को शुद्ध जल उपलब्ध कराने की जिम्मेवारी प्रशासन और वन विभाग की है, लेकिन सभी ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है. इन आदिवासी परिवारों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वन विभाग की ओर से एक चापाकल लगवाया गया था, लेकिन देख-रेख के अभाव में लंबे अरसे से चापाकल खराब है.
जानवरों का सताता है भय: जंगल में रहकर जीवन यापन कर रहे गंदूरी गंजू, डेंगनी देवी, इंदिरा देवी, पूनम देवी व राजेश कुमार भोगता ने बताया कि खाने के लिए तो सरकारी अनाज सस्ते दर पर मिल जाता है, लेकिन आजतक उन्हें सरकारी आवास नहीं मिल पाया.
पुराने मिट्टी के घर में परिवार के लोग रहते हैं. घर की जर्जर स्थिति के कारण हमेशा विषैले सांप व जानवरों का भय सताता रहता है. लगभग प्रत्येक वर्ष हाथियों का झुंड आता है और घरों को तोड़ देता है. वहीं घर में रखे अनाज को भी तहस-नहस कर दिया जाता है.
ग्रामीणों के अनुसार पिछले साल कई लोगों के घरों को हाथियों ने तोड़ दिया. बाद में उन्हें मुआवजा के रूप में मात्र 12 सौ रुपये मिले. इस वन्य प्राणी आश्रयणी के अंदर नौ बस्ती बसे हुए हैं. कमोबेश सभी की स्थिति एक जैसी है. किसी बस्ती के लोग कुएं का गंदा पानी पीते हैं, तो किसी बस्ती के लोग नदियों के सोती से मिट्टी खोदकर पानी निकाल सेवन करते हैं. कुछ ही जगहों पर चापाकल नजर आते हैं.

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