गुमला का फुटबॉल जुनून: कभी मैच के लिए थम जाता था शहर, अब बेटियां रच रहीं इतिहास

गुमला में फुटबॉल के सुनहरे दौर से लेकर आज की बेटियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता तक की पूरी खेल यात्रा के बारे में विस्तार से जानें.

गुमलाः गुमला की फुटबॉल की कहानी सिर्फ मैदान पर खेले गए मुकाबलों की कहानी नहीं है, बल्कि यह शहर के जुनून, खेल संस्कृति और बदलते दौर की कहानी भी है. गुमला के वरिष्ठ पत्रकार विजय आनंद ने करीब 20 साल पहले और आज के फुटबॉल के दौर की अपनी पुरानी यादों को साझा करते हुए गुमला की खेल यात्रा को याद किया.

शाम चार बजते ही सुनसान हो जाती थीं सड़कें

विजय आनंद बताते हैं कि एक समय गुमला में फुटबॉल को लेकर ऐसा जुनून था कि शाम चार बजते ही शहर की अधिकांश सड़कें सुनसान नजर आने लगती थीं. वजह होती थी खेल मैदान में दो टीमों के बीच होने वाला मुकाबला. मैच देखने के लिए शहर के साथ आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग मैदान पहुंचते थे. जिस दिन फुटबॉल मैच होता, पूरा गुमला खेल के रंग में रंग जाता था.

स्कूली बच्चों में भी फुटबॉल को लेकर जबरदस्त उत्साह था. एसएस हाई स्कूल और संत इग्नेशियस हाई स्कूल के विद्यार्थियों के बीच अक्सर मैत्री मैच आयोजित होते थे. एसएस स्कूल का एक कर्मचारी बोरे में फुटबॉल लेकर शाम चार बजे मैदान पहुंच जाता था. इसके बाद छात्र गेंद निकालकर अपनी-अपनी टीमें बनाते और खेल में जुट जाते थे. उस समय खेल का मैदान काफी बड़ा हुआ करता था. आज उसी स्थान पर स्टेडियम बन चुका है.

संत इग्नेशियस स्कूल ने रचा इतिहास

फुटबॉल के प्रति इसी जुनून ने आगे चलकर गुमला को राष्ट्रीय पहचान दिलायी. संत इग्नेशियस हाई स्कूल की टीम ने प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सुब्रतो कप का खिताब दो बार अपने नाम किया. यह वह दौर था, जब गुमला अविभाजित बिहार का हिस्सा हुआ करता था.

ये भी पढ़ें- लोहरदगा में अपराधियों का तांडव: सड़क निर्माण साइट पर तीन राउंड फायरिंग, वाहनों में लगाई आग; गार्ड को लगी गोली

70-80 के दशक में चरम पर था फुटबॉल का क्रेज

70 और 80 के दशक में गुमला में फुटबॉल का क्रेज चरम पर था. लोहरदगा, सिमडेगा और रांची की टीमें स्थानीय मुकाबलों के लिए गुमला आती थीं. धीरे-धीरे यहां राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले भी होने लगे. कोलकाता, आसनसोल, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा और राउरकेला समेत कई जगहों की टीमें गुमला पहुंचने लगीं. राज्य और केंद्र सरकार के सहयोग से गुमला में दो बार अखिल भारतीय खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन भी हुआ. इसी दौर में गुमला को ‘खेल नगरी’ के रूप में पहचान मिलने लगी.

क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ी, लेकिन खेल का जुनून कायम

समय के साथ फुटबॉल और हॉकी के प्रति लोगों का पुराना जुनून कुछ कम हुआ और क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ने लगी. हालांकि विशेष अवसरों पर आज भी मैत्री फुटबॉल मैच आयोजित होते हैं और स्टेडियम में खिलाड़ी नियमित अभ्यास करते हैं.

झारखंड बनने के बाद बेटियों ने संभाली कमान

झारखंड गठन के बाद गुमला की खेल यात्रा ने एक नया मोड़ लिया. फुटबॉल और हॉकी में बेटियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी और इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई देने लगा. खेल सुविधाओं में भी पहले की तुलना में सुधार हुआ है. झारखंड सरकार ने खेल प्रशिक्षण के लिए यहां सेंटर भी शुरू किया है. हॉकी को गुमला के पुराने लोकप्रिय खेलों में माना जाता है. पहले लड़कियों की खेल गतिविधियां सीमित थीं, लेकिन झारखंड बनने के बाद बेटियों ने खेल के मैदान में अपनी मजबूत पहचान बनाई.

ये भी पढ़ें- सुब्रतो कप में तीसरी बार राष्ट्रीय चैंपियन बनीं गुमला की बेटियां, उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने दी बधाई

सुब्रतो कप से राष्ट्रीय टीम तक पहुंचीं बेटियां

संत पैट्रिक स्कूल की छात्राओं ने राष्ट्रीय स्तर पर सुब्रतो कप का खिताब जीतकर गुमला का नाम रोशन किया. वहीं अष्टमी उरांव जैसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी का राष्ट्रीय टीम में चयन और एशिया कप के लिए जगह बनाना गुमला की बेटियों की बदलती खेल तस्वीर की बड़ी मिसाल है. कभी जिन मैदानों में फुटबॉल के जुनून के कारण शहर की रफ्तार थम जाती थी, आज उसी गुमला की बेटियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं. यही गुमला की बदलती खेल यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और उसकी नई पहचान है.


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >