गुमला नगरपालिका का गठन 1973 ईस्वी का हुआ था, जनसंख्या बढ़ी, टैक्स बढ़ा, पर नहीं मिली सुविधा

गुमला नगरपालिका का गठन 1973 ईस्वी के सरकारी गजट में हुआ.

पुरुष वोटर : 18525

महिला वोटर : 20765

टोटल वोटर : 39290

दुर्जय पासवान, गुमला

गुमला नगरपालिका का गठन 1973 ईस्वी के सरकारी गजट में हुआ. उस समय गुमला में 10 वार्ड हुआ करता था. गुमला में नगरपालिका का पहला चुनाव 1978 ईस्वी में हुआ. इसके अध्यक्ष सत्यनारायण प्रसाद, उपाध्यक्ष नवल किशोर सिंह व सभापति मनरखन गोप चुने गये थे. इसके बाद 1983 व 1988 ईस्वी में चुनाव हुआ. इसके बाद 1993 ईस्वी को गुमला नगरपालिका सुपर सीट हो गया. 1991 ईस्वी के जनगणना में नगरपालिका की जनसंख्या 40 हजार से घटकर 39972 हो गया. इस प्रकार नगरपालिका में 38 लोग कम हो गये. सरकारी गजट के अनुसार जनसंख्या कम होने के कारण नगरपालिका को नगर पंचायत में बदल दिया गया और पूर्व के 10 वार्ड को बढ़ाकर 20 वार्ड कर दिया गया. 20 वर्षो (1988 ईस्वी) के बाद 2008 ईस्वी को गुमला नगर पंचायत का चुनाव हुआ. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष सहित 20 वार्ड पार्षदों का चुनाव हुआ. 1993 ईस्वी से अबतक गुमला शहर के लोग छह चुनाव देख चुके हैं. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व वार्ड पार्षद को भी चुन चुके हैं. लेकिन अभी तक गुमला की तकदीर व तसवीर नहीं बदली है. आज भी गुमला शहर के कई मुहल्ले विकास की बाट जोह रहा है. ऐसे, अब नगर पंचायत से गुमला नगर परिषद हो गया है और शहर में 20 वार्ड से बढ़कर 22 वार्ड हो गया है. पांच साल पहले हुए नगर परिषद के चुनाव के बाद गुमला शहरी क्षेत्र के 22 वार्डो का कुछ कायाकल्प हुआ है. लेकिन अभी भी कई समस्याएं मुंह बायें खड़ी है. हालांकि नगर परिषद के चुनाव के बाद टैक्स में बेतहाशा वृद्धि हुई है. पहले टैक्स प्रतिवर्ष साढ़े तीन लाख रुपये प्राप्त होता था. परंतु अब टैक्स प्रतिवर्ष लाखों रुपये में प्राप्त होता है. टैक्स बढ़ा, लेकिन गुमला शहरी क्षेत्र की समस्या दूर नहीं हुई. आज भी गुमला शहरी क्षेत्र की आधी जनसंख्या सप्लाई पानी से वंचित है. कई मुहल्लों में चापानल नहीं है. चलने के लिए रोड नहीं है. नाली नहीं है. नगर पंचायत को जल, होल्डिंग टैक्स, बस पड़ाव, दुकान, सब्जी बाजार, साइकिल, रिक्शा, टेंपो से टैक्स प्राप्त होता है.

पब्लिक मुददा : यूरिनल एक दर्द कथा, पेशाब लगा, तो सड़क के किनारे कहीं भी बैठ जाते हैं

: आम पब्लिक के लिए कहीं नहीं है यूरिनल की व्यवस्था, शर्म छोड़ सड़क के किनारे व सरकारी दीवारों को यूरिनल के रूप में उपयोग करते हैं.

1 गुम 1 में सुषमा कुजूर

1 गुम 2 में शकुंतला उरांव

1 गुम 3 में शैल मिश्रा

1 गुम 4 में सीता देवी

गुमला. शहर में यूरिनल की सुविधा नहीं है. अगर है, तो गंदा है या बेकार है. वह भी सीमित स्थानों पर है. जिसका यूज किया नहीं जा सकता. ऐसे में जब महिलाएं व युवतियां कुछ खरीदारी करने शहर निकलती हैं तो उन्हें परेशानी होती है. खासकर, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं सबसे ज्यादा परेशानी झेलती है. क्योंकि शहर में कहां वे बैठे. इसके लिए वे जगह तय नहीं कर पाती. ऐसे में कई बार देखा गया है. शहर के कम आवाजाही वाले स्थान को यूरिनल के रूप में उपयोग किया जाता है. प्रशासन ने कभी महिलाओं की इस समस्या पर गौर नहीं किया. यही कारण है. आज भी महिलाएं घर से निकलती हैं. तो टॉयलेट का उपयोग घर पर ही कर लेती हैं. गलती से अगर मार्केट में टॉयलेट लग गया तो घर पहुंचकर ही टॉयलेट का उपयोग करती हैं. प्रभात खबर ने शहर के यूरिनल की पड़ताल की. चार स्थानों पर तेलंगा खड़िया स्टेडियम, पटेल चौक, पालकोट रोड शारदा कॉम्पलेक्स व बाजार टांड़ के पास यूरिनल है जो पीले रंग से रंगा हुआ है. परंतु, मेन रोड, जशपुर रोड, सिसई रोड, थाना रोड जो भीड़-भाड़ वाला इलाका है. जहां आवागमन अधिक होती है. दुकानें अधिक है. वहां यूरिनल की व्यवस्था नहीं है. इस कारण महिलाओं को दिक्कत होती है. गुमला शहर में कई जगह सरकारी शौचालय है. परंतु, उसमें बिना पैसा के आप शौचालय को यूज नहीं कर सकते. शौचालय है, भी तो पटेल चौक, बस पड़ाव व तालाब के पास है. शहर में यूरिनल नहीं होने से सड़क के किनारे बैठने से शर्म भी आती है. परंतु, इसके सिवा कोई सुविधा भी नहीं है.

पुरुषों को भी होती है परेशानी

अक्सर देखा गया है कि महिलाओं की तरह पुरुषों को भी पेशाब करने के लिए परेशानी झेलनी पड़ती है. शहर में भीड़ वाले इलाके में यूरिनल नहीं है. ऐसे में अगर पेशाब लग जाये तो फिर परेशानी होती है. बच्चों को तो कहीं भी बैठाकर पेशाब करा दिया जाता है. परंतु, जो बड़े हैं. उन्हें सुनसान जगह खोजना पड़ता है. खासकर, जो दूसरे जिले व शहर से आते हैं. उन्हें गुमला की भौगोलिक बनावट की जानकारी कम होती है. इसलिए बाहर से आने वाले लोगों को भी परेशानी होती है.

सरकारी दीवार ही बन जा रहे यूरिनल

सरकारी कार्यालयों के समीप भी यूरिनल की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में अगर दूर-दराज से आने वाले लोगों को पेशाब लगा तो सरकारी दीवार के कोना को ही लोग यूरिनल के रूप में उपयोग कर लेते हैं. यहां तक कि स्टेडियम के अंदर की दीवार को भी यूरिनल बना दिया है. यही वजह है. कई सरकारी दीवारों की स्थिति यूरिनल के रूप में उपयोग होने के कारण बेकार दिखता है.

महिलाओं की मांग : गुमला में पिंक यूरिनल का हो निर्माण

आज से 20 साल पहले गुमला शहर की आबादी कम थी. दुकानें कम थी. मुहल्ले कम थे. खुले स्थान अधिक था. जहां आवागमन कम होता था. ऐसे में किसी को पेशाब लगा तो सुनसान जगह को यूरिनल के रूप में उपयोग कर लेते थे. परंतु, अब शहर की आबादी घनी हो गयी है. इसलिए यूरिनल की जरूरत है.

सुषमा कुजूर, पूर्व वार्ड पार्षद, गुमला

गुमला शहर में महिलाओं के लिए पिंक कलर के यूरिनल व टॉयलेट का निर्माण हो. जिसका उपयोग सिर्फ महिलाएं ही कर सके. नया यूरिनल या टॉयलेट बने. या फिर जो पुराने टॉयलेट है. उसे ही पिंक कलर कर किसी एक टॉयलेट को सिर्फ महिलाओं के यूज के लिए रखा जाये. इससे शर्म से बचा जा सकेगा.

शंकुतला उरांव, महिला समाज सेवी

कई बड़े शहरों में महिलाओं के लिए स्पेशल पिंक कलर का टॉयलेट या फिर यूरिनल शहर के बीच बना हुआ है. जिसका उपयोग महिलाएं व युवतियां सहज तरीके से करती हैं. इसलिए गुमला में भी पिंक कलर का यूरिनल व टॉयलेट का निर्माण होना चाहिए. क्योंकि गुमला शहर के भीड़ वाले इलाके में यूरिनल नहीं है.

शैल मिश्रा, पूर्व वार्ड पार्षद, गुमला

गुमला शहर में जहां भीड़-भाड़ का इलाका है. वहां पिंक कलर का यूरिनल का निर्माण हो. क्योंकि शहर में कई बड़े होटल, मॉल, दुकानें खुल गयी. परंतु, कहीं भी यूरिनल की अच्छी व्यवस्था नहीं है. शहर की सड़कों के किनारे भी यूरिनल नहीं है. ऐसे में जगह का चयन कर यूरिनल का निर्माण किया जा सकता है.

सीता देवी, पूर्व वार्ड पार्षद, गुमला

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By VIKASH NATH

VIKASH NATH is a contributor at Prabhat Khabar.

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