जारी,गुमला: जारी प्रखंड के गोविंदपुर पंचायत में रुद्रपुर गांव स्थित है. यह गांव भगवान शिव के वास स्थल के रूप में भी माना जाता है. यहां प्राचीन शिवमंदिर है, जिसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना बताया जाता है. गांव के अलग-अलग स्थानों पर अनगिनत शिवलिंग देखे जा सकते हैं. इसी कारण रुद्रपुर मंदिर से श्रद्धालुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है.
राजा रुद्र प्रताप सिंह ने कराया था मंदिर का निर्माण
ग्रामीणों के अनुसार, करीब एक हजार वर्ष पूर्व रुद्र प्रताप सिंह नामक राजा इस रास्ते से गुजर रहे थे. रुद्रपुर के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर वह यहां रुके. इसी दौरान उन्होंने बूढ़ा महादेव में शिवलिंग देखा. इसके बाद उन्होंने यहां भव्य मंदिर बनवाने का निर्णय लिया और सेनापतियों को मंदिर निर्माण का आदेश दिया.
मंदिर से कुछ दूरी पर राजा रुद्र प्रताप सिंह ने राजमहल भी बनवाया था. उन्होंने गांव का नाम रुद्रपुर रखा. इसी दौरान शिवगुटरा मंदिर, देउर महादेव और बूढ़ा महादेव की भी स्थापना की गयी.
ग्रामीणों के अनुसार, कुछ वर्षों बाद मुगल शासक औरंगजेब इस रास्ते से गुजरे. उनकी नजर मंदिर और राजमहल पर पड़ी. इसके बाद मंदिर और राजमहल को ध्वस्त करा दिया गया तथा शिवलिंगों को इधर-उधर फेंक दिया गया. बाद में जहां-जहां शिवलिंग मिले, स्थानीय लोगों ने उन्हें वहीं स्थापित कर दिया.
पूर्वजों ने खुदाई कर शिवलिंग निकाला
रुद्रपुर के पूर्वजों विक्रम सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, रामप्रसाद सिंह और शिव प्रसाद सिंह ने ध्वस्त मंदिर की खुदाई कर मिट्टी हटायी और शिवलिंग निकाला. इसके बाद उन्हें पुनः स्थापित किया गया. ग्रामीणों का मानना है कि मंदिर के ध्वस्त होने के बाद भी कई शिवलिंग जमीन के अंदर दबे हो सकते हैं. खुदाई होने पर यहां से प्राचीन धरोहर मिलने की संभावना जतायी जाती है.
मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद
रुद्र प्रताप सिंह द्वारा बनवाये गये मंदिर में इस्तेमाल की गयी ईंट, पत्थर और दीवार के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं. रुद्रपुर के आसपास की पहाड़ियों में भी कई निशान मौजूद हैं.
गांव के पश्चिम में एक छोटी पहाड़ी टीले के आकार में है. ग्रामीणों के अनुसार, यहां भी मंदिर था, जिसे ध्वस्त कर दिया गया. इसके अवशेष के रूप में पत्थर की दो विशाल चौखटों के ऊपर एक बड़ा पत्थर रखा हुआ है.
मंदिर से करीब 500 गज की दूरी पर देउर मंदिर है. यहां स्थापित शिवलिंग का पत्थर विशेष प्रकार का बताया जाता है. ध्वस्त मंदिर को देव मंदिर भी कहा जाता है.
सोना टुकू और खेलड़ी पत्थर भी आकर्षण
कुछ दूरी पर सोना टुकू नामक स्थान है. ग्रामीणों के अनुसार, सोना का अर्थ सोना और टुकू का अर्थ पत्थर होता है. मान्यता है कि प्राचीन काल में इस पत्थर के अंदर सोना रखा गया था. प्रारंभ में सोना टुकू में दरारनुमा गड्ढा था, जिसमें सोना-चांदी रखा जाता था. बाद में दरार बंद हो जाने से सोना पत्थर के अंदर ही रह गया. इसी कारण इसे सोना टुकू कहा जाता है.
पहाड़ में एक विशाल पत्थर है, जिसे खेलड़ी पत्थर कहा जाता है. इस पर नाचती महिला और वाद्य यंत्र का चित्र अंकित है. ग्रामीणों के अनुसार, यहां राजा-महाराजा नाच-गान किया करते थे.
मान्यता है कि क्षेत्र के ओझागुनी अपने गुणगान में कमलपुर के नकटी महादेव, रुद्रपुर के बूढ़ा महादेव, भिखमपुर के चराईहगा महादेव, बरवाडीह के नकटी महादेव, हरिहरपुर के जोगी लाता, खेतली के ब्रह्मदेवता और मझगांव के टांगीनाथ बाबा का सुमिरन करते हैं.
