बुरा न मानो होली है, अब नहीं देती सुनायी, सोशल मीडिया हावी

बुरा न मानो होली है, अब नहीं देती सुनायी, सोशल मीडिया हावी

प्रतिनिधि, गुमला बुरा न मानो होली है. होली का यह प्यार भरा शब्द अब सुनायी नहीं देता. होली में अपनापन की जगह अब डीजे, केमिकल रंग, सोशल मीडिया हावी हो गया है. बदलते परिवेश के साथ आज होली का स्वरूप काफी बदल गया है. अब लोग सोशल मीडिया पर बधाई देकर औपचारिकता निभाने लगे हैं. आधुनिक संगीत, डीजे, केमिकल रंग, सोशल मीडिया और सेल्फी संस्कृति ने त्योहार को नया रूप दे दिया है. पहले जहां रिश्तों की गर्माहट और अपनापन रंगों के साथ झलकता था. वहीं अब उत्सव में आधुनिकता और दिखावे का प्रभाव बढ़ता नजर आता है. जिससे रिश्तों में दूरियां भी बढ़ती दिखायी दे रही हैं. वहीं हुड़दंगियों से सौहार्द बिगड़ने का भय बना रहता है. होली पर्व पर प्रबुद्ध लोगों ने तब और अब की होली पर क्या कहा, सुने. बिशुनपुर प्रखंड के पूर्व प्रमुख जयमंगल उरांव ने कहा है कि पहले गांवों में होली का त्योहार काफी उत्साह और आपसी भाईचारे के साथ मनाया जाता था. लोग घर-घर जाकर एक-दूसरे को गुलाल लगाते थे. मिठाइयों का आदान-प्रदान कर होली की शुभकामनाएं देते थे. सामाजिक मेल-मिलाप और आपसी प्रेम को मजबूत करने का माध्यम होता था. लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कम हो गयी. सिसई निवासी 70 वर्षीय शिवप्रसाद साहू ने कहा कि 30 वर्ष पहले होली पारंपरिक और सादगीपूर्ण तरीके से मनायी जाती थी. लोग प्राकृतिक रंगों, ढोल-मांदर, लोकगीतों और सामूहिक मेल-मिलाप के साथ इस त्योहार का आनंद लेते थे. लगभग 10-15 दिन पहले से ही उत्सव की शुरुआत हो जाती थी. गांव-मुहल्लों में आपसी भाईचारा देखने को मिलता था और घर-घर जाकर अबीर-गुलाल लगाने की परंपरा थी. घाघरा प्रखंड के देवाकी गांव निवासी 78 वर्षीय रामस्वरूप मिश्र बताते हैं कि पहले होली में अपनापन सबसे बड़ा रंग होता था. हम सभी लोग टोली बनाकर घर-घर जाते थे. अब समय बदल गया है. डीजे और केमिकल रंगों का चलन बढ़ा है. लोग मोबाइल में व्यस्त रहते हैं. फिर भी होली का उत्साह और मिलन की भावना आज भी कायम है. ऐसे, पुरानी परंपराओं व दोस्ताना को जिंदा रखते हुए होनी मनाना चाहिए. बसिया प्रखंड के कलिगा के 70 वर्षीय उदयनाथ महतो कहा पहले गांव के सभी लोग मिल जुलकर होली मनाते थे. गांव में होली पर डोल निकाली जाती थीं. इस दौरान गांव के पुरोहित द्वारा राधा कृष्णा कि मूर्ति को लेकर पूरे गांव में घुमाया जाता था. जिसमें गांव के सैकड़ों लोग शामिल होकर ढोल नगाड़े के साथ झूमते थे. एक-दूसरे को रंग अबीर लगाते थे. नाचते गाते होली मानते थे. अब सब खत्म हो गया. कामडारा प्रखंड के मुरुमकेला गांव निवासी बुंदेश्वर सिंह कहते हैं. बहुत ही पारंपरिक तरीके से होली के पर्व को मानते थे. पहले होली सप्ताह भर पहले शुरू हो जाता था. लोग गीत गोविंद और ढोल तबला लेकर नाच गान और रंगो से सराबोर होता था. लेकिन अब तो वह माहौल ही नहीं लगता. लोगों को ज्यादातर फुहड़पन करते देखा जाता है जो समाज में गलत संदेश देता है. नशापान तक होली सिमट कर रहा गया. पालकोट के तापकारा पंचायत स्थित रेड़वा गांव निवासी पारा शिक्षक राजेंद्र सिंह का कहना है कि आज के होली और पहले का होली में जमीन आसमान का फर्क है. पहले लोग एक दूसरे से मिलकर होली मनाते थे. अब की होली लोग निजी तौर तरीके से बस परिवार में सिमट कर रह गया है. अब सिर्फ अपने परिवार के साथ खाने पीने तक ही रह गया है. होली अब फीका पड़ गया. परंपरा को बचाने की जरूरत है. जारी गांव निवासी एतवा बड़ाइक ने कहा है कि आज के होली और पहले की होली में बहुत अंतर है. आज लोग तरह तरह से बने केमिकल युक्त रंग का प्रयोग करते हैं. पहले जड़ी बूटी को पीसकर रंग बनाया जाता था. साथ ही होली से पहले फगुवा शिकार खेला जाता था. अब पुरानी परंपरा लगभग समाप्त होते जा रहा है. होली में सभी कोई एक जगह बैठकर फगुवा गीत का आनंद लेते थे. वह समाप्त हो गया है. डुमरी प्रखंड के बुजुर्ग जगरनाथ प्रसाद ने बीते दिनों की यादें ताजा करते हुए कहा कि पहले और अब की होली मनाने के तरीके में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है. पहले होली केवल एक दिन का नहीं, बल्कि पूरे सप्ताह का उत्सव होता था. एक सप्ताह पहले से ही गांव में होली का उल्लास दिखायी देने लगता था. जहां कहीं भी लोगों का जमावड़ा होता. वहां फगुआ गीतों के मधुर स्वर लहरियां गूंज उठती थीं.

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Author: Akarsh Aniket

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