गुमलाः देश की आजादी के बाद गुमला ने विकास और बदलाव के कई दौर देखे हैं. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष से लेकर जमींदारी प्रथा के विरोध में हुए उलगुलान तक, गुमला की धरती ने कई आंदोलनों और वीरों की गाथाएं अपने भीतर समेटी हैं. समय के साथ गुमला के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वरूप में भी बड़ा परिवर्तन आया है. गुमला के पूर्व पत्रकार विजय आनंद बताते हैं कि 50 और 60 के दशक का गुमला आज के गुमला से पूरी तरह अलग था. 17 मई 1983 तक गुमला रांची जिले का अनुमंडल हुआ करता था. इसके बाद 18 मई 1983 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा ने भव्य समारोह में गुमला को जिले का दर्जा दिया. जिस मैदान में जिला गठन का समारोह हुआ था, वह आज एक शानदार स्टेडियम का रूप ले चुका है.
जिले के साथ बदला उपायुक्त का कार्यालय
गुमला के प्रशासनिक बदलाव की सबसे रोचक कहानी जिले के उपायुक्त के कार्यालय और चेंबर से जुड़ी है. अब तक उपायुक्त का चेंबर करीब सात बार स्थानांतरित हो चुका है. गुमला के प्रथम उपायुक्त द्वारका प्रसाद के कार्यकाल में उपायुक्त कार्यालय के चेंबर में परमवीर चक्र विजेता लांस नायक अलबर्ट एक्का की तस्वीर लगायी गयी थी. इसी कक्ष में उन्होंने जिले के पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी. यह पत्रकारों के लिए उस समय का यादगार अनुभव रहा. हालांकि, करीब एक वर्ष के भीतर ही उपायुक्त का कार्यालय स्टेडियम नंबर दो के समीप बने नये भवन में स्थानांतरित कर दिया गया.
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लालू यादव के चॉपर से जुड़ा किस्सा
उपायुक्त कार्यालय के दूसरे चेंबर से जुड़ा एक किस्सा उस दौर में शहर में काफी चर्चित रहा. उस समय चुनाव का मौसम था और गुमला जिला वर्तमान की तुलना में काफी बड़ा था, क्योंकि सिमडेगा अनुमंडल भी गुमला जिले का हिस्सा था.
एक चुनावी दौरे के दौरान तत्कालीन बिहार मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चॉपर उपायुक्त कार्यालय से सटे उस समय के बड़े मैदान में उतरा. लालू प्रसाद यादव सीधे उपायुक्त के चेंबर में चले गए. सुरक्षाकर्मियों ने कार्यालय का दरवाजा बंद कर दिया और पत्रकारों को अंदर जाने से रोक दिया गया. करीब 15 से 20 मिनट बाद लालू प्रसाद यादव बाहर निकले और चॉपर से रवाना हो गए. इसके बाद शहर में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई. लोग सवाल उठाने लगे कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के दौरान बंद कमरे में प्रशासनिक अधिकारी के साथ किस मुद्दे पर बातचीत हुई थी. हालांकि, इस मुलाकात को लेकर उस समय कई तरह की चर्चाएं ही होती रहीं.
विकास भवन से समाहरणालय तक पहुंचा कार्यालय
इसके बाद उपायुक्त कार्यालय का तीसरा स्थानांतरण विकास भवन की दूसरी मंजिल स्थित बड़े हॉल में हुआ. कुछ समय बाद उपायुक्त का चेंबर और अदालत नवनिर्मित समाहरणालय भवन में स्थानांतरित कर दिया गया. तत्कालीन उपायुक्त एएनपी सिन्हा के कार्यकाल में उपायुक्त कार्यालय और अदालत नये समाहरणालय भवन में पहुंचे. यहां लंबे समय तक जिला प्रशासन का कामकाज चलता रहा. इसके बाद उपायुक्त कार्यालय में पांचवां बदलाव हुआ. अंचल परिसर में खाली पड़ी जमीन पर एक नया भवन बनाया गया, जहां उपायुक्त का चेंबर स्थानांतरित किया गया. चेंबर छोटा होने के कारण कुछ समय बाद इसे ठीक बगल में बने दूसरे भवन में स्थानांतरित करना पड़ा. यह उपायुक्त कार्यालय का छठा बदलाव था.
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चंदाली में बना आधुनिक समाहरणालय
गुमला के उपायुक्त कार्यालय का सातवां और सबसे बड़ा बदलाव शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर चंदाली में हुआ. यहां आधुनिक और भव्य समाहरणालय भवन का निर्माण किया गया. इसका ऑनलाइन उद्घाटन भी हो चुका है. नये समाहरणालय भवन में जिले के लगभग सभी प्रमुख कार्यालयों को स्थानांतरित किया गया है. गुमला के प्रशासनिक इतिहास में उपायुक्त के चेंबर का बार-बार स्थानांतरण अपने आप में एक दिलचस्प तथ्य है. संभवतः झारखंड का यह इकलौता जिला होगा, जहां समय और जरूरत के साथ उपायुक्त का चेंबर सात अलग-अलग स्थानों पर पहुंचा. यह बदलाव सिर्फ एक कार्यालय के स्थानांतरण की कहानी नहीं, बल्कि गुमला के बदलते प्रशासनिक और विकासात्मक सफर की तस्वीर भी पेश करता है.
