खेतीबारी ही हमारी जीविकोपार्जन का मुख्य साधन है. हमारी नियुक्ति मामले में हाईकोर्ट में केस दर्ज भी हुआ था. कोर्ट द्वारा सीधी नियुक्ति में विलंब होने पर 50-50 हजार मुआवजा देने का आदेश दिया गया था, लेकिन मुआवजा भी नहीं मिला. आज भी हम तीनों नौकरी की आस में जिला मुख्यालय का चक्कर काटने को विवश हैं. इधर ,तीनों लाभार्थियों ने प्रभात खबर प्रतिनिधि को सीएम जनसंवाद में अपनी शिकायत दर्ज कराने की बात कही. उन्होंने कहा कि जब तक हमें न्याय नहीं मिल जायेगा, तब तक अपने हक के लिए संघर्ष जारी रखेंगे.
नौकरी के लिए भटक रहे हैं आदिम जनजाति के तीन लोग
गुमला: सरकार का फैसला है कि स्नातक पास आदिम जनजातियों को सीधी नौकरी देना है, लेकिन गुमला के आदिम जनजाति के तीन युवक व एक युवती वर्ष 2010 से नौकरी की आस में भटक रहे हैं. इन्हें अभी तक नौकरी नहीं मिली है. इनमें बिशुनपुर प्रखंड के जोभीपाठ गांव निवासी सुरेंद्र असुर, ललित असुर, डोकापाट […]

गुमला: सरकार का फैसला है कि स्नातक पास आदिम जनजातियों को सीधी नौकरी देना है, लेकिन गुमला के आदिम जनजाति के तीन युवक व एक युवती वर्ष 2010 से नौकरी की आस में भटक रहे हैं. इन्हें अभी तक नौकरी नहीं मिली है. इनमें बिशुनपुर प्रखंड के जोभीपाठ गांव निवासी सुरेंद्र असुर, ललित असुर, डोकापाट के मिखाइल असुर व सखुवापानी की सुशीला कुमारी शामिल हैं. ज्ञात हो कि वर्ष 2010 में गुमला के उपायुक्त (उस वक्त के) राहुल शर्मा के समय में इनका चयन किया गया था.
आदिम जनजाति विभाग रांची द्वारा आवेदन जमा लिया गया था, जिसमें तीन हजार आवेदन गुमला जिला कल्याण विभाग को प्राप्त हुआ था. इसमें छटनी करते हुए चार लोगों का चयन कर जिला कल्याण विभाग द्वारा सरकार को भेजी गयी है. चार लोगों में सुरेंद्र असुर, ललित असुर, सुशीला कुमारी व मिखाइल असुर शामिल हैं. नौकरी के लिए जब मिखाइल का चयन हुआ था, उसकी उम्र नौकरी करने की थी. लेकिन नौकरी की आस में चक्कर काटते हुए उसकी नियुक्ति की उम्र पार कर गयी. फिर भी उसे नियुक्ति नहीं मिली. वहीं उपरोक्त तीनों नौकरी की आस में जिला मुख्यालय का चक्कर काट रहे हैं.
सुशीला कुमारी ने कहा : गरीबी में जी रहे हैं
सखुवापानी की सुशीला कुमारी नौकरी की आस में आज भी लगी हुई है. वर्ष 2010 से नौकरी के लिए चक्कर काटते के बाद वर्ष 2015 में उसका विवाह परिजनों ने लुपुंगपाठ में कर दिया. वह अभी भी नौकरी की आस में जिला मुख्यालय का चक्कर काट रही है. उसने कहा कि हम सभी अति सूदूरवर्ती गांव जोभीपाठ व सुखवापानी से आये हैं. हमारे यहां सिर्फ हिंडालको कंपनी बॉक्साइट उत्खनन का कार्य करती है, लेकिन कंपनी गांव का विकास नहीं करती है. हमारे परिजन खेती बारी करते हैं.