रोहिणी नक्षत्र के आरंभ होते ही पोड़ैयाहाट प्रखंड के गांवों में एक बार फिर हल-बैल की घंटियां गूंजने लगी हैं. आधुनिक समय में ट्रैक्टर के बढ़ते उपयोग के बावजूद किसान अपनी पुरानी परंपराओं को आज भी जीवित रखे हुए हैं. सकरी फुलवार, द्रुपद और अमवार पंचायत के किसान खरीफ फसल की तैयारी में जुट गये हैं और हल-बैल के माध्यम से खेतों की जुताई कर रहे हैं. सकरी फुलवार गांव के कई किसान सुबह लगभग पांच बजे ही बैलों की जोड़ी लेकर खेतों में पहुंच गये. किसानों का कहना है कि रोहिणी नक्षत्र में हल चलाने की परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है. उनका मानना है कि पहली जुताई हल-बैल से करने पर धरती माता प्रसन्न होती हैं और फसल बेहतर होती है.द्रुपद गांव के किसान भवेश दास ने बताया कि हल से जुताई करने पर मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे उसकी उर्वरक क्षमता बनी रहती है और केंचुए भी सुरक्षित रहते हैं. इससे खेत में नमी भी अधिक समय तक बनी रहती है. अमवार पंचायत के किसान बबलू किस्कू ने कहा कि भले ही आज ट्रैक्टर उपलब्ध हैं, लेकिन पहली जुताई हमेशा हल-बैल से ही की जाती है. उन्होंने कहा कि यह हमारी सांस्कृतिक परंपरा है. हमारे पूर्वज कहते थे कि रोहिणी में हल चले तो खेत सोना उगलता है.
रोहिणी नक्षत्र में खेतों में लौटी हल-बैल की परंपरा
पोड़ैयाहाट के गांवों में खरीफ की तैयारी शुरू, ट्रैक्टर के साथ पारंपरिक जुताई भी जारी
