Giridih News: बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं बेटी बांध गांव के ग्रामीण

Giridih News: एक ओर जहां देश स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर डुमरी प्रखंड के धावाटांड़, बिरहोरगढ़ा और बेटी बांध गांव में निवास करने वाले ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. आजादी के 75 साल से अधिक बीत जाने के बाद भी इन गांवों तक विकास नहीं पहुंच सका है.

धावाटांड़ से बिरहोरगढ़ा होते हुए बेटी बांध तक जाने वाली सड़क आज भी कच्ची है. करीब तीन किलोमीटर लंबे इस संपर्क मार्ग की हालत इतनी जर्जर है कि बरसात के मौसम में इन गांवों का संपर्क प्रखंड मुख्यालय से पूरी तरह कट जाता है. यह इलाका मुख्य रूप से आदिवासी बहुल है और यहां करीब 250 से अधिक लोग निवास करते हैं. ग्रामीणों के लिए यही एकमात्र रास्ता है जो कीचड़, गड्ढों और पत्थरों से भरा हुआ है. इसके चलते बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को रोजाना जान जोखिम में डालकर चलना पड़ता है. इन गांवों की सबसे बड़ी परेशानी तब सामने आती है, जब किसी व्यक्ति की तबियत बिगड़ती है. ऐसे में पक्की सड़क के अभाव में ग्रामीण आज भी मरीजों को खटिया खट पर लादकर कंधे पर ढोते हुए अस्पताल पहुंचाते हैं. यह दृश्य अब भी यहां आम है. गांव की महिलाएं बताती है कि बरसात के मौसम में सड़कें दलदल बन जाती है जिससे चलना तक मुश्किल हो जाता है.

Giridih News: रमेश सोरेन स्कूल जाना छोड़ा, प्रभात खबर से बात करते हुए छलका युवक का दर्द

प्रभात खबर से बात करते हुए गांव के रमेश सोरेन ने छात्रों व युवाओं की पीड़ा सुनायी. कहा कि स्कूल जाने के लिए उन्हें हर दिन करीब डेढ़ किलोमीटर जंगल और कच्चे, ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है. कई बार हादसे भी होते हैं, रमेश ने कहा कि मैंने करीब एक वर्ष पूर्व स्कूल जाना छोड़ दिया. ग्रामीणों का कहना है कि कुछ साल पहले इस पथ पर कुछ सौ फीट की पीसीसी सड़क और मिट्टी-मोरम डालने का काम हुआ था. इसके साथ दो छोटी पुलियों का निर्माण भी कराया गया था, लेकिन समय और बारिश की मार ने वह काम भी पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. एक पुलिया के पास तो सड़क कटकर खतरनाक बन चुकी है. रमेश ने कहा कि हमलोग आज भी डिबरी युग में जीने को मजबूर हैं. बच्चे हों या बुजुर्ग, सभी इसी पथरीले रास्ते पर चलने को विवश हैं. आज तक कोई नेता या अधिकारी यहां झांकने तक नहीं आया.

Giridih News: आदिवासी परिवारों के पास पीने के लिए पानी का कोई स्थाई स्रोत या चापाकल नहीं, टिकला घुटू नाले से बुझाते हैं प्यास

ग्रामीण विनोद सोरेन ने बताया कि बेटी बांध गांव की हालत और भी दयनीय है. यहां के पहाड़ी इलाके में रहने वाले आदिवासी परिवारों के पास पीने के पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं है. गांव में एक भी चापाकल नहीं है. बरसात के दिनों में “टिकला घुटू नाला ” में बहता पानी ही उनकी प्यास बुझाने का जरिया होता है. गर्मी के मौसम में ग्रामीणों को करीब एक किलोमीटर दूर जंगल के भीतर स्थित चुआं से पानी लाना पड़ता है.

Giridih News: कीचड़ में चलना बहुत जोखिम भरा है

कई बार हम लोग इस रास्ते में गिरकर घायल हो चुके हैं. बरसात के दिनों में कीचड़ में चलना बहुत जोखिम भरा है. गांव में अगर किसी महिला का प्रसव पीड़ा होती है तो उसे अपस्ताल ले जाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. – किरण देवी

Giridih News: गाड़ी जंगल में ही छोड़कर पैदल पहुंचते हैं घर

गांव में सड़क न होने के कारण बरसात में हम लोग गाड़ी जंगल में ही छोड़कर पैदल कीचड़ से होकर किसी तरह घर पहुंचते हैं. बीमार को खाट पर उठाकर सड़क तक लाना पड़ता है. बेटी बांध के ग्रामीणों की मांग है उन्हें जल्द से जल्द पक्की सड़क की सुविधा मिले ताकि वे भी एक सामान्य, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सके. – विजय सोरेन

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Author: MAYANK TIWARI

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