प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि दिगंबर जैन मुनि परंपरा में केशलोंच त्याग, सहनशीलता और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है. दिगंबर जैन मुनिराज दो-चार माह के अंतराल पर अपने हाथों से केशलोंच कर देह के प्रति ममता त्यागने तथा आत्म साधना को सुदृढ़ करने का संदेश देते हैं. यह जैन मुनियों के 28 मूलगुणों में शामिल है.
सम्यक दर्शन पर प्रकाश डाला
इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि आत्मविश्वास का वास्तविक अर्थ आत्मा पर विश्वास है. यह केवल मानसिक शक्ति से नहीं, बल्कि चेतना के जागरण से उत्पन्न होता है. जैन साधना में इसे सम्यक दर्शन कहा गया है, जो मोहग्रंथि के भेदन से प्रकट होता है. उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में शंका, नकारात्मक विचार और विपरीत हालात व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर कर देते हैं, लेकिन जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह स्वयं को अजर, अमर और अविनाशी मानते हुए भय, शंका और विपत्तियों से विचलित नहीं होता. मुनि श्री ने आत्मविश्वास को दो भागों व्यावहारिक और आध्यात्मिक में विभाजित किया. कहा कि व्यावहारिक आत्मविश्वास परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है, जबकि आध्यात्मिक आत्मविश्वास स्थायी व अटल होता है. उन्होंने लोगों से अपनी अंतर चेतना को जागृत करने तथा आत्मविश्वास के बल पर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया.
क्रोध पर नियंत्रण के बताये उपाय
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने क्रोध नियंत्रण पर भी समाधान देते हुए कहा कि आत्मचिंतन, प्रतिक्रमण और भावनायोग इसके प्रभावी उपाय हैं. उन्होंने कहा कि क्रोध मानव जीवन की स्वाभाविक भावना है, लेकिन अनियंत्रित क्रोध व्यक्ति और उसके संबंधों के लिए हानिकारक सिद्ध होता है. उन्होंने कहा कि क्रोध कम करने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले मन में यह संकल्प लेना चाहिए कि उसे क्रोध नहीं करना है. यदि क्रोध उत्पन्न हो जाये, तो तुरंत पश्चाताप करना चाहिए और संभव हो तो संबंधित व्यक्ति से क्षमा याचना कर मन में क्षमा भाव रखना चाहिए.
