गुणायतन परिसर में सोलह कारण पर्व की धर्मसभा, मुनि प्रमाण सागर बोले पूजा के साथ व्यवहार और आचरण में भी दिखना चाहिए धर्म

मुनि प्रमाण सागर ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि आचरण में बदलाव है. सोलह कारण पर्व पर उन्होंने जीवन में धर्म की सुगंध उतारने का संदेश दिया.

गिरिडीह. सोलह कारण पर्व के पावन अवसर पर गुणायतन परिसर में आयोजित धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने धर्म और आत्म परिवर्तन का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि जीवन का लक्ष्य केवल धर्म करना नहीं, बल्कि धर्म की आराधना के माध्यम से स्वयं में सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए.

मुनि श्री ने कहा कि मंदिर जाकर पूजा-पाठ कर लेना मात्र धर्म नहीं है. धर्म को अपने विचार, व्यवहार, भाव और आचरण में उतारना ही उसकी सच्ची आराधना है. धार्मिक व्यक्ति की पहचान उसकी धार्मिक क्रियाओं से अधिक उसके व्यवहार से होती है. व्यवहार में सहजता, मन में संतोष, प्रवृत्तियों में संयम और आचरण में शालीनता दिखे, तभी समझना चाहिए कि धर्म भीतर उतर रहा है.

धर्म की ज्योति का प्रकाश व्यवहार में दिखना चाहिए

मुनि श्री ने कहा कि यदि भीतर धर्म की ज्योति जल रही है तो उसका प्रकाश हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए. हमारा उद्देश्य दूसरों को प्रभावित करना नहीं, बल्कि स्वयं को बदलना होना चाहिए.

भगवान का अभिषेक करते श्रद्धालु

उन्होंने पूजा का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि एक घंटे पूजा करने के बाद किसी की टिप्पणी से हमारा संयम समाप्त हो जाये, तो हमें आत्ममंथन करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि जिस तरह अगरबत्ती बुझने के बाद भी उसकी सुगंध वातावरण में बनी रहती है, उसी तरह आराधना के बाद भी हमारे व्यवहार में धर्म की सुगंध बनी रहनी चाहिए.

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मुनि श्री ने कहा कि प्रवचन और धार्मिक आयोजन तभी सार्थक हैं, जब उनसे व्यक्ति के विचार, व्यवहार और आचरण में सकारात्मक बदलाव आये. सोलह कारण पर्व को केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे आत्म परिवर्तन का पर्व बनाना चाहिए.

बच्चों को उपदेश से अधिक आचरण से मिलते हैं संस्कार

मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने नयी पीढ़ी में संस्कार को लेकर भी अभिभावकों को संदेश दिया. उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कार केवल उपदेश देने से नहीं मिलते, बल्कि वे माता-पिता के आचरण से अधिक सीखते हैं. बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने घर और आसपास के माहौल में देखते हैं.

उन्होंने कहा कि संतान में बदलाव की अपेक्षा करने से पहले अभिभावकों को स्वयं आदर्श आचरण अपनाना होगा. माता-पिता का व्यवहार ही बच्चों के संस्कार की मजबूत नींव बनता है.

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By Bhola pathak

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