शाश्वत तीर्थ क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर स्थित गुणायतन में इन दिनों देश के विभिन्न प्रांतों से आये श्रद्धालु मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज के मंगल प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं. सोमवार को प्रवचन देते हुए सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि धर्म की सशक्त परंपरा साधु की साधना और श्रावक की आराधना के समन्वय से ही आगे बढ़ती है. साधु अपनी तपस्या, संयम और आत्मशुद्धि से धर्म का आदर्श प्रस्तुत करता है, जबकि श्रावक श्रद्धा, सेवा, दान और सहयोग के माध्यम से उस आदर्श को समाज में स्थापित करता है. दोनों के संतुलन से ही धर्म का मार्ग सुदृढ़, प्रभावी और स्थायी बनता है. मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि केवल साधना या केवल आराधना, दोनों में से कोई भी अपने आप में पर्याप्त नहीं है. साधना प्रेरणा देती है, जबकि उसे समाज में प्रसारित करने का कार्य श्रावक करता है. इसी प्रकार बिना आदर्श के आराधना केवल औपचारिक बनकर रह जाती है, इसलिए धर्म की प्रगति के लिए दोनों का संतुलन आवश्यक है. धर्म के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि धर्म बाहरी आडंबर का विषय नहीं, बल्कि आंतरिक आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है. जीवन में विचारों की पवित्रता, लक्ष्य की स्पष्टता और आचरण की सावधानी से ही धर्म जीवित रहता है. जब व्यक्ति धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प लेता है, तभी उसके जीवन की दिशा बदलती है.
दान तीज का महत्व बताया
दान तीज के महत्व पर बोलते हुए मुनि श्री ने कहा कि दान केवल धन का त्याग नहीं, बल्कि लोभ का परित्याग है दान से करुणा, समर्पण और संवेदना का विकास होता है, जो आगे चलकर साधना का आधार बनता है. उन्होंने आहार दान, पूजा दान, ज्ञान दान और अभय दान को दान की प्रमुख विधएं बतायीं. उन्होंने कहा कि दान से मन की शुद्धि होती है और साधना से मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है. शुद्ध मन ही धर्म को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है. अपने प्रवचन के अंत में उन्होंने कहा कि दान धर्म का द्वार है और साधना धर्म का सार. इस अवसर पर संघस्थ मुनि श्री संघान सागर महाराज, मुनि श्री सार सागर महाराज, मुनि श्री समादर सागर महाराज, मुनि श्री रूप सागर महाराज सहित आर्यिकाश्री एवं त्यागी वृत्ति उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन अशोक भैया व अभय भैया ने किया.
