दीपक पुनरिआर ने कहा कि कुड़मी आदिवासी समाज अभी पूरे झारखंड में एकजुट होकर अपनी संवैधानिक पहचान और हकों की लड़ाई लड़ रहा है. इसी क्रम में कुर्मी आदिवासी समाज के बैनर तले राज्य के अलग-अलग जिलों में सेमिनार और जनजागरण सभायें आयोजित की जा रही हैं. समाज का स्पष्ट कहना है कि कुड़मी समुदाय संविधान की अनुसूचित जनजाति सूची में दर्ज है.
सोची-समझी साजिश के तहत नहीं दिया जा रहा अधिकार
लेकिन आजादी के बाद से एक सोची-समझी साजिश के तहत हमें आदिवासी मानने से रोका गया. इसका सबसे बड़ा कारण हमारी जमीन है. वक्ताओं ने कहा कि संविधान में कुड़मी/कुर्मी समाज को आदिवासी सूची में जगह मिली हुई है. 1931 की जनगणना और बाद के दस्तावेजों में भी हमारी आदिवासी पहचान दर्ज है. इसके बावजूद आजादी के बाद प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक कारणों से हमें आदिवासी मानने से रोका गया. समाज के प्रबुद्धजनों के अनुसार यह रोक सिर्फ पहचान के लिए नहीं बल्कि जमीन के लिए थी. आज हमारे पास जितनी जमीन बची है, वह सिर्फ इसलिए बची है, क्योंकि हम आदिवासी सूची में हैं.
