हड्डी मामले की जांच के लिए टीम गठित

कार्रवाई. हड्डी उपकरण मेें मनमाना पैसा वसूली मामले में औषधि निदेशालय ने उठाया कदम रांची : राजधानी के अस्पतालों में हड्डी के उपकरणों के नाम पर की जा रही वसूली की जांच के लिए चार सदस्यीय टीम का गठन किया गया है. राज्य औषधि निदेशालय ने टीम के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है. […]

कार्रवाई. हड्डी उपकरण मेें मनमाना पैसा वसूली मामले में औषधि निदेशालय ने उठाया कदम
रांची : राजधानी के अस्पतालों में हड्डी के उपकरणों के नाम पर की जा रही वसूली की जांच के लिए चार सदस्यीय टीम का गठन किया गया है. राज्य औषधि निदेशालय ने टीम के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है. टीम का नेतृत्व औषधि निरीक्षक शैल अंबष्ट करेंगी, जिसमेें औषध निरीक्षक पूनम तिर्की, नसीम आलम एवं राजीव एक्का शामिल है. टीम को 10 दिनों में जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है.
टीम राजधानी के हड्डी रोग के प्रमुख अस्पतालों की जांच करेगी. गौरतलब है कि ‘प्रभात खबर’ ने 30 जनवरी को ‘चार गुना पैसा वसूल रहे हैं रांची के अस्पताल’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी. इसके अगले दिन ही यह मामला विधानसभा में उठा था. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पूरे मामले की जांच कराने का निर्देश दिया था.
रिम्स की होगी जांच :जांच टीम राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स के हड्डी विभाग की जांच भी करेगी. जांच टीम यह देखेगी कि रिम्स में ऑपरेशन के प्रयोग किये जानेवाले उपकरण की क्या व्यवस्था है. उपकरण किसी अधिकृत एजेंसी से मंगाया जाता है या नहीं. उपकरण लगानेवाले मरीज को उसका बिल दिया जाता है या नहीं.
रांची : सिमडेगा के 10 वर्षीय देव कुमार को रेफर करने की जांच रिम्स प्रबंधन करेगा. प्रबंधन बुधवार को इस पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनायेगा. रिम्स निदेशक डॉ बीएल शेरवाल ने कहा कि देव कुमार को आखिर क्या हो गया था कि उसे निजी अस्पताल में रेफर करना पड़ा? यह पता किया जायेगा कि नियोनेट वार्ड में वेंटिलेटर खाली रहते हुए भी तो कहीं बच्चे को रेफर नहीं कर दिया गया था? अगर ड्यूटी कर रहे चिकित्सक ने लापरवाही बरती होगी, तो उनसे स्पष्टीकरण मांगा जायेगा एवं नियमसंगत कार्रवाई की जायेगी.
गौरतलब है कि राजू मेहर सांस की समस्या होने पर परिजनों ने उसे सिगडेगा सदर अस्पताल में भरती कराया था. वहां के चिकित्सकों ने बेहतर इलाज के लिए राजधानी भेजा. रिम्स में बच्चे को भरती किया गया, लेकिन बाद में उसे रेफर कर दिया गया. इसके बाद पिता राजधानी के निजी अस्पताल में इलाज के लिए गुहार लगाते रहे, लेकिन पैसा नहीं होने के कारण उसे भरती नहीं लिया गया.

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