दीपावली महापर्व के द्वितीय पर्व ‘नरक चतुर्दशी’ पर विशेष
अनु दीदी
दीपावली से एक दिवस पहले की रात्रि को ‘नरक चतुर्दशी’ मनायी जाती है, जिसे ‘छोटी दिवाली’ भी कहते हैं. इसके बारे में अनेक किंवदंतियां अथवा पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. एक आख्यान है कि चिरातीत काल में एक ऐसा समय था जब नरकासुर ने सारी सृष्टि पर अपना आधिपत्य जमा लिया था.
भगवान ने नरकासुर का नाश कर सृष्टि को उसके भय से मुक्त किया और देवताओं को नरकासुर के बंधन से छुड़ाया. दूसरी कथा है कि दैत्य राजा बलि ने सारे भू-मंडल पर अपना एक छत्र राज जमा लिया था. तब पृथ्वी पर आसुरीयता फैल रही थी. धर्म-निष्ठा नष्टप्राय हो चली थी. तब राजा बलि ने श्री लक्ष्मी को सभी देवी-देवताओं सहित अपने कारागार का बंदी बना लिया हुआ था.
उस समय भगवान ने राजा बलि की आसुरी शक्ति पर विजय प्राप्त करके श्री लक्ष्मी व सभी देवी-देवताओं को कारागार की यातनाओं से छुड़ाया. उसी के उपलक्ष्य में तब से हर वर्ष इस रात्रि को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है. इन आख्यानों का अक्षरश: अर्थ तो अग्राह्य ही है क्योंकि किसी एक व्यक्ति द्वारा श्री लक्ष्मी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं जिनकी संख्या 33 करोड़ है अथवा सारी सृष्टि को बंदी बना देना तो संभव ही नहीं है. वास्तव में इन दोनों कथाओं में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृतांत को लाक्षणिक भाषा में रूपक देकर वर्णन किया गया है.
नरकासुर माया अर्थात मनोविकारों का ही पर्यायवाची है. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को नरक का द्वार भी कहा गया है और आसुरी लक्षण भी. चूंकि इन विकारों अथवा आसुरी लक्षणों पर विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है इसलिए इन्हीं का नाम इस रूपक में बलि है. गीता में माया को ही दुस्तर अथवा बलि कहा गया है.
आज जब लोग दीपावली का त्योहार मनाते हैं तो वे इस मर्म को सामने नहीं रखते कि यह नरकासुर अथवा बलि के अंत अर्थात आसुरीयता की पराजय का स्मरणोत्सव है. हम इस बात को भूले होते हैं कि अमावस्या अथवा अंधकार अज्ञानता एवं विकारों का प्रतीक है. यह भक्तों की प्रार्थना से स्वत: ज्ञात है- तमसो मा ज्योतिर्गमय यानी प्रभु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो.
इस दिन अपने-अपने भवन, गली, मोहल्ले और चाराहों पर रोशनी करना महज स्थूलता है और दीपावली के ज्ञान पक्ष को कमतर करना है. दीपावली के इस ज्ञान पक्ष की उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि हर वर्ष मिट्टी के दीप अथवा आधुनिक परिपाटी के अनुसार मोमबतियों और बिजली से रोशनी करने के बाद भी लक्ष्मीजी का भारत में स्थायी वास नहीं है. भ्रष्टाचार ही राजा बलि अथवा नरकासुर बनकर सब पर अपना आधिपत्य जमाए हुए है जिसके परिमाण स्वरूप आधी आबादी निर्धनता से जूझ रही है.
दरअसल, विश्व के इतिहास में कलियुग के अंत का समय ऐसा समय है जब विकारों का सब नर-नारियों के मन पर राज्य होता हैऔर तब सारी सृष्टि नर्क बनी होती है. इसलिए कहा जा सकता है कि तब राजा बलि अथवा नरकासुर का ही सृष्टि पर आधिपत्य था.
सतयुग में भारत स्वर्ग भूमि था और वहां के वासी देवी-देवता थे, परंतु जन्म-मरण के चक्र में आते हुए वे कलियुग के अंत में सृष्टि को नर्क बनाने वाले और नर-नारी को असुर बनाने वाले इन विकारों अथवा बलि के अधीन हो गये थे. तब कलियुग के अंत में ईश्वरीय ज्ञान देकर परमपिता परमात्मा ने इन विकारों के प्रतीक नरकासुर का अंत किया और सतयुग में जो मानवी आत्माएं श्री लक्ष्मी अथवा अन्य देवी-देवता नाम से अभिज्ञात थे, उन्हें इस नरकासुर के बंधन से मुक्त कराया. इसी अत्यंत महत्वपूर्ण की याद में आज भी हर वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को छोटी दीपावली मनायी जाती है. दीपावली का त्योहार मनाते हुए इस मर्म को सामने रखना होगा. अपने-अपने भवन, गली, मोहल्ले और चौराहों को रोशन करने के अलावा अपने भीतर के अंधकार को मिटाने के लिए अथवा अपने अंतर्मन में भी ज्योति जगाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए.
साधक लोग कार्तिक मास में अमावस्या से एक रात पहले वाली अंधेरी रात्रि को महारात्रि मानकर जागरण करते हैं और मंत्र को सिद्ध करते हैं. साधक लोग साधना के लिए इसे अपना प्रमुख त्योहार मानते हैं. यह मान्यता भी कलियुग के अंत की घोर अज्ञान रात्रि से संबंधित है. कलियुग के अंतिम चरण में जो कोई भी परमात्मा द्वारा दिये गये मार्गदर्शन अथवा मंत्रणा के अनुसार चलता है, उसको सर्व सिद्धियां प्राप्त होती हैं.
भक्त लोग ये भी मानते हैं कि जो इस रात्रि को आलस्य वश सोया रहता है वह श्री लक्ष्मी के आशीर्वाद से वंचित रहता है. कलियुग के अंतिम चरण में जो व्यक्ति अज्ञान निंद्रा में सोये रहते हैं, वे आने वाले सतयुग में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण के सुख पूर्ण स्वराज्य में सौभाग्य का स्थान प्राप्त नहीं कर सकते.
(लेखिका ब्रह्माकुमारीज की धनबाद सेंटर की प्रमुख हैं.)
