35 वर्षों का विवाद सुलझने के बाद परियोजना की राह हुई आसान

इंद्रपुरी जलाशय परियोजना-2 से तीन राज्यों की बदल सकती है तस्वीर

इंद्रपुरी जलाशय परियोजना-2 से तीन राज्यों की बदल सकती है तस्वीर विजय सिंह, भवनाथपुर झारखंड और बिहार के बीच सोन नदी पर प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित कधवन जलाशय परियोजना, जिसे अब इंद्रपुरी जलाशय परियोजना-2 के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर सुर्खियों में है. करीब 35 वर्षों से जल बंटवारे को लेकर अटकी यह महत्वाकांक्षी योजना अब निर्णायक चरण में पहुंच गयी है. हालिया घटनाक्रमों से यह संकेत मिल रहा है कि लंबे समय से ठप पड़ी इस परियोजना को जल्द ही धरातल पर उतारा जा सकता है, जिससे झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों की तस्वीर बदल सकती है. गढ़वा जिले के केतार प्रखंड के खैरवा गांव और बिहार के रोहतास जिले के नौहट्टा प्रखंड के मटिआंव गांव के बीच सोन नदी पर प्रस्तावित यह परियोजना लंबे समय से क्षेत्रीय विकास की उम्मीदों का केंद्र रही है. दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे पर सहमति नहीं बनने के कारण यह योजना कई वर्षों तक अटकी रही. लेकिन अब इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है.13 जनवरी 2026 को बिहार कैबिनेट ने परियोजना निर्माण और झारखंड के साथ जल बंटवारे के मसौदे को मंजूरी दी. इसके साथ ही दोनों राज्यों के बीच अंतिम समझौते (एमओयू) पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया अंतिम चरण में है. केंद्रीय जल आयोग द्वारा भी इस मसौदे को हरी झंडी मिलने से परियोजना निर्माण की बड़ी बाधाएं दूर हो चुकी हैं. पहले अविभाजित बिहार के हिस्से के 7.75 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) पानी के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पा रही थी. जुलाई 2025 में पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में इस मुद्दे का समाधान निकाला गया. इसमें बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2.0 एमएएफ पानी देने पर सहमति बनी. यही समझौता परियोजना को आगे बढ़ाने की सबसे बड़ी कुंजी माना जा रहा है. 1990 में हुआ था शिलान्यास इस परियोजना का इतिहास काफी पुराना है. 1990 में एकीकृत बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे ने इसका शिलान्यास किया था. उस समय सोन नदी के दोनों किनारों पर सर्वे, ड्रिलिंग और तकनीकी अध्ययन का काम शुरू हुआ था. करोड़ों रुपये खर्च कर प्रारंभिक तैयारियां की गयीं और गढ़वा में परियोजना कार्यालय स्थापित कर अभियंताओं की तैनाती की गयी, लेकिन कुछ वर्षों बाद कार्य अचानक बंद हो गया और योजना अधर में लटक गयी. वर्ष 2016 में परियोजना पर फिर से हलचल शुरू हुई. केंद्रीय जल आयोग की अध्यक्षता में झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधियों की बैठक में कधवन डैम निर्माण पर सहमति बनी. बैठक में जलाशय के पूर्ण भंडारण स्तर 169 मीटर और अधिकतम जलस्तर 171 मीटर निर्धारित किया गया. नयी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने का निर्णय लिया गया. केंद्रीय ��ल आयोग ने 2017 में आवश्यक प्रशासनिक आदेश जारी किये. 2019 में बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग ने डीपीआर तैयार करने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू की. सर्वे कार्य दिल्ली की कंसल्टेंट कंपनी के माध्यम से कराया गया और भू-अर्जन तथा तकनीकी आकलन की प्रक्रिया तीनों राज्यों की सहमति से आगे बढ़ी. जिले केे 12 गांव होंगे प्रभावित, पुनर्वास चुनौती इस जलाशय परियोजना से तीन राज्यों के कुल 58 राजस्व गांव डूब क्षेत्र में आयेंगे. झारखंड के गढ़वा जिले के 12 गांव प्रभावित होंगे, जिनमें खैरवा, चांदडीह, बिजडीह, गम्हरिया, पचाडूमर, छाताकुंड, बतों, मुनमुन, परती कुशवानी, पिपरा, चंदना और खोखा शामिल हैं. बिहार के रोहतास जिले के नौहट्टा प्रखंड के पांच गांव प्रभावित होंगे, जिनमें जदुनाथपुर, जारादाग, मटिआंव, नावाडीह और कला शामिल हैं. उत्तर प्रदेश के 43 गांव, जैसे बसुहारी, मेहरपुर, चोपन, ओबरा, बनारी, गुठानी और गायघाट सहित अन्य गांव परियोजना से प्रभावित होंगे. परियोजना सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और क्षेत्रीय विकास के नये आयाम स्थापित करेगी, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापन और पुनर्वास की चुनौती भी सामने आयेगी. प्रभावित लोगों के लिए उचित मुआवजा, पुनर्वास और आजीविका विकल्प सुनिश्चित करना सरकारों की बड़ी जिम्मेदारी होगी. अब सभी की निगाहें अंतिम एमओयू पर हस्ताक्षर और जमीन पर कार्य शुरू होने पर टिकी हैं.

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By Akarsh aniket

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