जितेंद्र सिंह गढ़वा गढ़वा शहर के बीचों-बीच बहने वाली सरस्वती नदी कभी जीवन का आधार हुआ करती थी. इस नदी का निर्मल जल न केवल प्यास बुझाता था, बल्कि स्नान, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक जीवन का केंद्र भी था. सुबह-शाम नदी किनारे लोगों की चहल-पहल रहती थी और कल-कल करती धारा दूर से ही अपनी मौजूदगी का एहसास कराती थी. यह नदी गढ़वा की पहचान और संस्कृति का हिस्सा थी. लेकिन आज वही नदी अतिक्रमण, सीवरेज के गंदे पानी और कूड़ा-कचरे की मार से बदहाल होकर बदबूदार नाले में तब्दील हो चुकी है. हालात इतने खराब हो गए हैं कि नदी किनारे खड़ा होना भी मुश्किल हो गया है. जगह-जगह प्लास्टिक, घरेलू कचरा और गंदगी का अंबार दिखाई देता है. 25 वर्षों में सिर्फ आश्वासन करीब 25 साल पहले तक सरस्वती नदी गढ़वा की शान मानी जाती थी. लेकिन बीते ढाई दशकों में कई विधायक बदले, मंत्री बदले, अधिकारी आए और चले गए. नगर परिषद का गठन हुआ, करोड़ों रुपये सफाई और विकास के नाम पर खर्च होने की बातें हुईं, मगर नदी की हालत लगातार बिगड़ती चली गयी. सवाल यह उठता है कि आखिर इस तबाही का जिम्मेदार कौन है? क्या उन जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए जिन्होंने हर चुनाव में विकास के वादे किये, लेकिन नदी को बचाने की दिशा में ठोस पहल नहीं की? क्या उन अधिकारियों से जवाब नहीं पूछा जाना चाहिए जिनके कार्यकाल में नदी पर अतिक्रमण बढ़ता गया और सीवरेज का गंदा पानी सीधे नदी में गिरता रहा? कई लोग सरस्वती नदी को अपना निजी डस्टबिन समझ बैठे हैं इस स्थिति के लिए केवल नेता और अधिकारी ही जिम्मेदार नहीं हैं. आम लोग भी कहीं न कहीं बराबर के दोषी हैं. शहर के कई लोग सरस्वती नदी को अपना निजी डस्टबिन समझ बैठे हैं. घरों का प्लास्टिक, गंदगी और कचरा खुलेआम नदी में फेंका जा रहा है. कई लोगों ने अतिक्रमण कर नदी में घर और चाहरदीवारी बना ली है. वे अपने घर को तो साफ रखते हैं, लेकिन नदी को कचरों से भरते जाते हैं. ऐसे लोगों को भी चिन्हित कर जवाबदेही तय की जानी चाहिए. जिस नदी ने कभी शहर को जीवन दिया, आज उसी का गला घोंटा जा रहा है. यदि समय रहते लोग नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में ही सरस्वती नदी का नाम पढ़ेंगी. अब युद्ध स्तर पर कार्रवाई की जरूरत गढ़वा की जनता अब यह मांग कर रही है कि नगर परिषद अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे और सरस्वती नदी को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर अभियान चलाये. नदी की सफाई करायी जाये, अतिक्रमण हटाया जाये, सीवरेज का पानी रोकने की व्यवस्था हो, कचरा फेंकने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाये और जनजागरूकता अभियान चलाया जाये. यदि अभी भी ठोस कदम नहीं उठाये गये, तो यह प्राकृतिक धरोहर पूरी तरह खत्म हो जायेगी. अभिषेक भारद्वाज का अभियान गढ़वा के युवा अभिषेक भारद्वाज लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं. वे पिछले कई दिनों से शहर के रंका मोड़ पर हाथों में तख्ती लेकर चिलचिलाती धूप में खड़े होकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं. उनका कहना है कि गढ़वा के अधिकारी, विधायक, मंत्री और सांसद नदी को बचाने की दिशा में गंभीर पहल नहीं कर रहे हैं, जो बेहद दुखद है. उन्होंने उपायुक्त से अपील करते हुए कहा कि गढ़वा की प्राकृतिक विरासत सरस्वती नदी को बचाया जाए, क्योंकि नदी ही जीवनदायिनी है. सोशल मीडिया पर उठती आवाज अब सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोग सरस्वती नदी को बचाने की मांग तेज कर रहे हैं. शहरवासियों का कहना है कि यह सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि गढ़वा की पहचान और संस्कृति का हिस्सा है. यदि अभी भी लोग नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी. दो नदियों पर संकट गढ़वा शहर के बीच से दानरो और सरस्वती जैसी दो प्रमुख नदियां बहती हैं. कभी ये दोनों नदियां शहर की पहचान और लोगों के जीवन का आधार मानी जाती थीं. लेकिन आज दोनों नदियों की स्थिति लगभग एक जैसी हो चुकी है. अतिक्रमण, गंदगी, सीवरेज के पानी और लगातार बढ़ती लापरवाही ने इन नदियों को बदहाल कर दिया है. यदि समय रहते इन नदियों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाये गये, तो आने वाले दिनों में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं. भूजल स्तर प्रभावित होगा, जल संकट गहराएगा, प्रदूषण बढ़ेगा और पर्यावरणीय संतुलन पर भी बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है.
कभी जीवनदायिनी थी सरस्वती नदी, आज बन गयी जहरीली धारा
कभी जीवनदायिनी थी सरस्वती नदी, आज बन गयी जहरीली धारा
